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दुर्गेशनंदिनी

मुग़ल और पठानों के संघर्ष के बीच बंगाल में सत्ता की लड़ाई चरम पर है। इसी उथल-पुथल में मुग़ल सेना का राजपूत योद्धा, जगत सिंह, घायल होकर एक दुर्ग में शरण लेता है। वहाँ उसकी नज़र दुर्गपति की रूपवती कन्या तिलोत्तमा पर पड़ती है और दोनों के दिलों में प्रेम का अंकुर फूटता है। लेकिन युद्ध के इस दौर में भावनाएँ सुरक्षित नहीं रहतीं। दुश्मन की क़ैद, कर्तव्य की पुकार और दिल की चाहत के बीच घिरा जगत सिंह खुद को एक कठिन अग्निपरीक्षा में पाता है। क्या तलवारों की खनक और सियासत के दांव-पेच के बीच यह प्रेम जीवित रह पाएगा?