देवदास by Matribhasa Hindi
नवाँ परिच्छेद
और देवदास? वह रात उसने कलकत्ता के ईडेन गार्डन की एक बेंच पर बैठकर काट दी। उसे बहुत कष्ट हो रहा था, यातना से मर्म विदीर्ण हो रहा था, ऐसा नहीं। एक प्रकार की शिथिल उदासीनता धीरे-धीरे उसके सीने में जमती जा रही थी। निद्रा में शरीर के किसी अंग पर अचानक पक्षाघात हो जाने पर, नींद टूटने पर जैसे उस अंग पर कोई अधिकार नहीं रह जाता, और चकित, स्तब्ध मन एक क्षण के लिए समझ नहीं पाता कि उसका जन्म का साथी, चिर-विश्वस्त अंग उसके बुलाने पर साड़ा क्यों नहीं दे रहा है; उसके बाद धीरे-धीरे समझ में आता है, धीरे-धीरे यह ज्ञान होता है कि वह अब उसका अपना नहीं रहा; देवदास उसी प्रकार धीरे-धीरे सारी रात यह समझ रहा था कि समय पर संसार को जैसे अचानक पक्षाघात हो गया है, और उससे उसका हमेशा के लिए विच्छेद हो गया है। अब उस पर झूठा रोष-अभिमान कुछ भी नहीं चलेगा। पुराने अधिकार की बात सोचना भी भूल होगी। तब सूर्योदय हो रहा था। देवदास उठ खड़ा हुआ और सोचने लगा, कहाँ जाऊँ? अचानक उसे कलकत्ता का अपना डेरा याद आया। वहाँ चूनीलाल है। देवदास चल पड़ा। रास्ते में दो-एक बार उसे धक्का लगा, ठोकर खाकर अँगुली लहूलुहान कर ली—लड़खड़ाकर एक व्यक्ति के ऊपर गिरने को हुआ, तो उसने शराबी कहकर उसे धकेल दिया। इसी तरह घूम-घूमकर दिन ढलने पर वह मेस के दरवाज़े पर आकर खड़ा हुआ। चूनीबाबू तब वेश-विन्यास करके निकल ही रहे थे—यह क्या, देवदास जो है!
देवदास चुपचाप ताकता रहा।
कब आए? मुँह सूखा है, स्नान-भोजन नहीं हुआ है—यह क्या—क्या! देवदास रास्ते पर ही बैठा जा रहा था, चूनीलाल ने हाथ पकड़कर उसे भीतर लिया। अपने बिस्तर पर बिठाकर, शांत करके पूछा, क्या बात है देवदास?
कल घर से आया हूँ।
कल? तो फिर सारे दिन कहाँ थे? और रात में भी कहाँ थे?
ईडेन गार्डन में।
पागल हो क्या! हुआ क्या है, बताओ तो?
सुनकर क्या होगा?
न बताओ, अभी खा-पी लो। तुम्हारा सामान कहाँ है?
कुछ भी नहीं लाया।
कोई बात नहीं, अभी खाने बैठो।
तब चूनीलाल ने ज़बरदस्ती कुछ खिलाकर, शय्या पर लेटने का आदेश देकर द्वार बंद करते-करते कहा, ज़रा सोने की कोशिश करो, मैं रात में आकर तुम्हें उठाऊँगा। यह कहकर वह उस समय के लिए चला गया। रात दस बजे के भीतर वह लौटकर आया तो देखा, देवदास उसके बिस्तर पर गहरी नींद में सोया हुआ है। उसे बिना जगाए, वह स्वयं एक कम्बल खींचकर, नीचे चटाई बिछाकर लेट गया। सारी रात में देवदास की नींद नहीं टूटी, सुबह भी नहीं, दिन के दस बजे वह उठकर बैठा और बोला, चूनीबाबू, कब आए?
बस अभी आ रहा हूँ।
तो तुम्हें कोई असुविधा नहीं हुई!
कुछ नहीं।
देवदास कुछ देर उसके मुँह की ओर देखता रहा, फिर बोला, चूनीबाबू, मेरे पास तो कुछ भी नहीं है, क्या तुम मेरा पालन-पोषण करोगे?
चूनीलाल हँसा। वह जानता था कि देवदास के पिता बहुत बड़े धनवान व्यक्ति हैं। इसलिए हँसकर बोला, मैं पालन-पोषण करूँगा! ख़ूब कहा। तुम्हारी जब तक इच्छा हो रहो, कोई चिंता नहीं।
चूनीबाबू, तुम्हारी आय कितनी है?
भाई, मेरी आय तो मामूली है। घर पर कुछ ज़मीन-जायदाद है, उसे दादा के पास गिरवी रखकर यहाँ रहता हूँ। वे हर महीने सत्तर रुपये भेज देते हैं। इसमें तुम्हारा-मेरा आराम से चल जाएगा।
तुम घर क्यों नहीं जाते?
चूनीलाल ने ज़रा-सा मुँह फेरकर कहा, वह लंबी कहानी है।
देवदास ने और कुछ नहीं पूछा। क्रमशः भोजन के लिए बुलावा आया। उसके बाद दोनों स्नान-भोजन समाप्त कर पुनः कमरे में आकर बैठे तो चूनीलाल ने कहा, देवदास, पिता के साथ झगड़ा किया है?
नहीं।
और किसी के साथ?
देवदास ने वैसा ही जवाब दिया, नहीं।
उसके बाद चूनीलाल को अचानक दूसरी बात याद आई। बोला, ओहो, तुम्हारा तो अभी विवाह ही नहीं हुआ है!
इसी समय देवदास दूसरी ओर मुँह फेरकर लेट गया। थोड़ी ही देर में चूनीलाल ने देखा, देवदास सो गया है। इसी तरह सोते-सोते और दो दिन बीत गए। तीसरे दिन सवेरे देवदास स्वस्थ होकर उठ बैठा। मुख से वह घनी छाया मानो बहुत कुछ हट गई हो, ऐसा बोध हुआ। चूनीलाल ने पूछा, आज तबीयत कैसी है?
लगता है, काफ़ी अच्छी है। अच्छा चूनीबाबू, रात में तुम कहाँ जाते हो?
आज चूनीलाल लज्जित हुआ; बोला, हाँ, सो तो जाता हूँ, पर यह बात क्यों?
अच्छा,—और तुम अब कॉलेज क्यों नहीं जाते?
नहीं—पढ़ाई-लिखाई छोड़ दी है।
छिः, ऐसा कहीं होता है? दो महीने बाद तुम्हारी परीक्षा है। तुम्हारी पढ़ाई भी बुरी नहीं हुई थी, इस बार परीक्षा क्यों नहीं देते!
नहीं—पढ़ाई छोड़ दी है।
चूनीलाल चुप रहा। देवदास ने पुनः पूछा, कहाँ जाते हो—बताओगे नहीं? तुम्हारे साथ मैं भी चलूँगा।
चूनीलाल ने देवदास के मुँह की ओर देखकर कहा, क्या है देवदास, मैं बहुत अच्छी जगह नहीं जाता।
देवदास मानो अपने आप से बोला, अच्छा और बुरा! सब बकवास!—चूनीबाबू, मुझे साथ नहीं ले चलोगे?
ले तो चल सकता हूँ। लेकिन तुम मत जाओ।
नहीं, मैं जाऊँगा ही। अगर अच्छा न लगा, तो फिर नहीं जाऊँगा। लेकिन तुम जिस सुख की आशा में प्रतिदिन उन्मुख रहते हो—जो भी हो चूनीबाबू, मैं निश्चय ही जाऊँगा।
चूनीलाल ने मुँह फेरकर ज़रा-सा हँसा; मन-ही-मन बोला, मेरी दशा! मुँह से बोला, अच्छा, तो चलना।
दोपहर ढले धर्मदास सामान लेकर उपस्थित हुआ। देवदास को देखकर रो पड़ा। देवता, आज तीन-चार दिन से माँ कितना जो रो रही हैं—
क्यों रे?
बिना कुछ कहे अचानक चले क्यों आए? एक पत्र निकालकर हाथ में देते हुए कहा, माँ की चिट्ठी है।
चूनीलाल भीतर की ख़बर समझने के लिए उत्सुक होकर ताकता रहा। देवदास ने पत्र पढ़कर रख दिया। जननी ने घर आने का आदेश और अनुरोध करके लिखा था। सारे घर में केवल वही देवदास के अकस्मात् अंतर्धान का कारण कुछ-कुछ अनुमान कर सकी थीं। धर्मदास के हाथ से छिपाकर बहुत-से रुपये भी भेजे थे। धर्मदास ने वे रुपये हाथ में देकर कहा, देवता, घर चलिए।
मैं नहीं जाऊँगा। तू लौट जा।
रात में दोनों मित्र सज-धजकर निकले। देवदास की इन सबमें वैसी प्रवृत्ति नहीं थी, किंतु चूनीलाल किसी भी तरह साधारण वेश में निकलने को राज़ी न हुआ। रात नौ बजे एक किराए की गाड़ी चितपुर के एक दोमंज़िले मकान के सामने आकर रुकी। चूनीलाल ने देवदास का हाथ पकड़कर भीतर प्रवेश किया। गृहस्वामिनी का नाम चंद्रमुखी था—उसने आकर स्वागत किया। इस बार देवदास का सर्वांग जल उठा। वह जो इन कई दिनों से अपने अनजाने ही नारी-देह की छाया तक से विमुख हो उठा था, यह वह स्वयं भी नहीं जानता था।
चंद्रमुखी को देखते ही उसके अंतस की प्रगाढ़ घृणा दावानल की भाँति सीने के भीतर प्रज्वलित हो उठी। चूनीलाल के मुँह की ओर देखकर भृकुटि तानकर बोला, चूनीबाबू, यह किस हतभागा जगह ले आए? उसका तीव्र कंठ और आँखों की दृष्टि देखकर चंद्रमुखी और चूनीलाल दोनों ही हतबुद्धि हो गए। दूसरे ही क्षण चूनीलाल ने स्वयं को सँभालकर देवदास का एक हाथ पकड़कर कोमल कंठ से कहा, चलो-चलो, भीतर जाकर बैठते हैं।
देवदास ने और कुछ न कहा—कमरे के भीतर आकर नीचे बिछी चादर पर विषादपूर्ण, नतमस्तक होकर बैठ गया। चंद्रमुखी भी चुपचाप कुछ दूर बैठ गई। नौकरानी चाँदी-मढ़े हुक़्क़े में तंबाकू सजाकर ले आई—देवदास ने स्पर्श भी नहीं किया। चूनीलाल मुँह भारी करके चुपचाप बैठा रहा। नौकरानी क्या करे, यह सोच न पाकर अंत में चंद्रमुखी के हाथ में ही हुक़्क़ा देकर चली गई। वह जब दो-एक कश खींच रही थी, तीक्ष्ण दृष्टि से देवदास उसके मुँह की ओर ताकता रहा, फिर अचानक अत्यंत घृणापूर्वक बोल उठा, क्या असभ्य और देखने में कैसी भद्दी है!
इससे पूर्व चंद्रमुखी को कोई कभी बातों में हरा नहीं सका था। उसे निरुत्तर कर देना अत्यंत कठिन कार्य था। किंतु देवदास की यह हार्दिक घृणा से भरी सीधी और कठोर उक्ति उसके भीतर तक जा पहुँची। क्षण भर के लिए वह हतबुद्धि हो गई। किंतु, कुछ देर बाद दो-एक बार और गुड़गुड़ की ध्वनि हुई, पर चंद्रमुखी के मुँह से और धुआँ नहीं निकला। तब चूनीलाल के हाथ में हुक़्क़ा देकर उसने एक बार देवदास के मुख की ओर देखा, उसके बाद निःशब्द बैठी रही। तीनों ही निर्बाक। केवल गुड़गुड़ करके हुक़्क़े की ध्वनि हो रही थी, किंतु वह भी मानो बड़े भय से। मित्रों के मध्य बहस छिड़ जाने पर अचानक एक निरर्थक कलह हो जाने पर, प्रत्येक जैसे चुपचाप मन-ही-मन फूलता रहता है, और क्षुब्ध अंतःकरण व्यर्थ ही कहता रहता है, यह क्या! उसी प्रकार तीनों ही मन-ही-मन कहने लगे, यह क्या! यह कैसा हो गया!
जैसा भी हो, किसी को भी चैन नहीं मिल रहा था। चूनीलाल ने हुक़्क़ा रखकर नीचे उतर गया, शायद और कोई काम ढूँढ़ न पाया,—इसलिए। कमरे में दो जन बैठे रहे। देवदास ने मुँह उठाकर कहा, तुम पैसे लेती हो?
चंद्रमुखी सहसा उत्तर न दे सकी। आज उसकी चौबीस वर्ष की आयु हो गई थी, इस नौ-दस वर्ष के भीतर कितने विभिन्न प्रकृति के लोगों से उसका घनिष्ठ परिचय हुआ था; किंतु ऐसा आश्चर्यजनक व्यक्ति उसने एक दिन भी नहीं देखा था। ज़रा हिचकिचाकर बोली, जब आपके श्रीचरणों की धूल पड़ी है—
देवदास ने बात पूरी न करने देकर कहा, चरणों की धूल की बात नहीं। पैसे लेती हो तो?
लेती तो हूँ ही। नहीं तो हमारा गुज़ारा कैसे होगा?
बस, और सुनना नहीं चाहता। कहकर उसने जेब में हाथ डालकर एक नोट निकाला और चंद्रमुखी के हाथ में देते ही जाने को उद्यत हुआ—एक बार देखा भी नहीं कि कितने का नोट दिया।
चंद्रमुखी ने विनीत भाव से कहा, इतनी जल्दी जाएँगे?
देवदास ने कोई उत्तर नहीं दिया—बरामदे में आकर खड़ा हो गया।
चंद्रमुखी की एक बार इच्छा हुई कि रुपये लौटा दे; किंतु एक प्रकार के तीव्र संकोच के वशीभूत होकर वह ऐसा न कर सकी, शायद उसे थोड़ा भय भी हुआ था। इसके अतिरिक्त, बहुत-सी लांछना, गंजना और अपमान सहने का अभ्यास उन्हें होता है, इसीलिए वह निर्बाक, निस्पंद होकर चौखट पकड़े खड़ी रही। देवदास सीढ़ियों से नीचे उतर गया।
सीढ़ियों पर ही चूनीलाल से भेंट हुई। उसने आश्चर्यचकित होकर प्रश्न किया, कहाँ जा रहे हो देवदास?
डेरे पर जा रहा हूँ।
यह क्या बात हुई?
देवदास दो-तीन सीढ़ियाँ और उतर गया।
चूनीलाल ने कहा, चलो, मैं भी चलता हूँ।
देवदास पास आकर उसका हाथ पकड़कर बोला, चलो।
ज़रा रुको, एक बार ऊपर से होकर आता हूँ।
नहीं, मैं चलता हूँ, तुम बाद में आना; कहकर देवदास चला गया।
चूनीलाल ऊपर आकर देखा, चंद्रमुखी अब भी उसी तरह चौखट पकड़े खड़ी है।
उसे देखकर बोला, मित्र चला गया?
हाँ।
चंद्रमुखी ने हाथ का नोट दिखाकर कहा, यह देखो। लेकिन ठीक समझो तो ले जाओ; अपने मित्र को लौटा देना।
चूनीलाल ने कहा, वह इच्छा से देकर गया है, मैं क्यों लौटाकर ले जाऊँगा?
इतनी देर बाद चंद्रमुखी थोड़ा-सा हँस सकी; किंतु उस हँसी में आनंद नहीं था। बोली, इच्छा से नहीं, हम पैसे लेती हैं, इसलिए क्रोध करके देकर गया है। हाँ, चूनीबाबू, वह व्यक्ति क्या पागल है?
तनिक भी नहीं। पर आज कई दिनों से शायद उसका मन ठीक नहीं है।
क्यों मन ठीक नहीं है—कुछ जानते हो?
यह तो नहीं जानता। शायद घर में कुछ हुआ होगा।
तो यहाँ क्यों ले आए?
मैं लाना नहीं चाहता था, वह स्वयं ज़बरदस्ती आया था।
चंद्रमुखी इस बार सचमुच बिस्मित हुई। बोली, ज़बरदस्ती ख़ुद आया था? सब कुछ जानकर?
चूनीलाल ने ज़रा सोचकर कहा, सो तो है ही! सब कुछ तो जानता ही था। मैं तो कोई फुसलाकर नहीं लाया।
चंद्रमुखी कुछ देर चुप रहकर कुछ सोचकर बोली, चूनी, मेरा एक उपकार करोगे?
क्या?
तुम्हारा मित्र कहाँ रहता है?
मेरे पास।
और एक दिन उसे ला सकोगे?
वह शायद नहीं कर पाऊँगा। इससे पहले भी वह कभी इन सब जगहों पर नहीं आया, और बाद में भी शायद नहीं आएगा। पर क्यों, बताओ तो?
चंद्रमुखी ने एक फीकी हँसी हँसकर कहा, चूनी, जैसे भी हो, फुसलाकर और एक बार उसे ले आना।
चूनी हँसा; आँख मारकर बोला, डाँट खाकर प्यार हो गया क्या?
चंद्रमुखी भी हँसी; बोली, बिना देखे नोट देकर चला जाता है—यह नहीं समझे?
चूनी चंद्रमुखी को कुछ-कुछ पहचानने लगा था। गरदन हिलाकर बोला, ना-ना, नोट-वोट वाले लोग अलग होते हैं—वह तुम नहीं हो। लेकिन सच्ची बात क्या है, बताओ तो?
चंद्रमुखी ने कहा, सचमुच थोड़ी माया पड़ गई है।
चूनी ने विश्वास नहीं किया; हँसकर बोला, इन पाँच मिनटों में?
इस बार चंद्रमुखी भी हँसने लगी। बोली, तो भी क्या। मन ठीक हो जाए तो और एक दिन ले आना—एक बार और देखूँगी। लाओगे न?
क्या जानें!
तुम्हें मेरे सर की क़सम रही।
अच्छा—देखूँगा।
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