देवदास by Matribhasa Hindi
तेरहवाँ परिच्छेद
पिता की मृत्यु के बाद छह महीने लगातार घर पर रहकर देवदास एकदम आजिज़ आ गया। न सुख, न शांति, नितांत एकरस जीवन। उस पर लगातार पार्वती की चिंता; आजकल हर काम में वह याद आती है। और तो और, भाई द्विजदास और पतिव्रता भाभी ने देवदास की पीड़ा को और भी बढ़ा दिया।
गृहिणी की अवस्था भी देवदास जैसी ही थी। पति की मृत्यु के साथ ही उनका सारा सुख समाप्त हो गया था। पराधीन होकर यह घर उनके लिए धीरे-धीरे असह्य होता जा रहा था। आज कई दिनों से वह काशीवास का संकल्प कर रही थीं; बस देवदास का विवाह कराए बिना जा नहीं पा रही थीं। कहती थीं—देवदास, एक ब्याह कर ले—मैं देख जाऊँ। लेकिन यह कैसे संभव था? एक तो अशौच की अवस्था, उस पर से मनपसंद कन्या की खोज भी करनी होगी। आजकल इसलिए गृहिणी को कभी-कभी दुःख होता कि उस समय पार्वती से विवाह करा दिया होता तो कितना अच्छा होता। एक दिन उन्होंने देवदास को बुलाकर कहा, देवदास, अब तो और नहीं सहा जाता—कुछ दिन काशी चली जाऊँ तो कैसा हो। देवदास की भी यही इच्छा थी; बोला, मैं भी यही कहता हूँ। छह महीने बाद लौट आने से काम चल जाएगा।
हाँ बेटा, वही कर। बाद में लौटकर, उनका काम-काज हो जाने पर, तेरा ब्याह करके तुझे गृहस्थी बसाते देख, मैं काशीवास करूँगी।
देवदास सहमत हो गया और अपनी माता को कुछ दिनों के लिए काशी में छोड़कर कलकत्ता चला गया। कलकत्ता आकर तीन-चार दिन तक देवदास ने चुनीलाल की खोज की। वह नहीं था, डेरा बदलकर कहीं चला गया था। एक दिन शाम को देवदास को चंद्रमुखी का खयाल आया। एक बार मिल आने में क्या हर्ज है? इतने दिनों तक वह ज़रा भी याद नहीं आई थी। देवदास को जैसे थोड़ी लज्जा आई, उसने एक गाड़ी भाड़े पर ली और शाम ढलने के कुछ ही देर बाद चंद्रमुखी के घर के सामने आ पहुँचा। बहुत देर तक पुकारने के बाद भीतर से किसी स्त्री के कंठ में उत्तर मिला—यहाँ नहीं।
सामने एक गैस-पोस्ट था, देवदास उसके निकट सरककर बोला, बता सकती हो, वह स्त्री कहाँ गई है?
खिड़की खोलकर उसने कुछ देर तक देखा, फिर कहा, तुम क्या देवदास हो?
हाँ।
ठहरो, दरवाज़ा खोलती हूँ।
द्वार खोलकर उसने कहा, आओ—
कंठस्वर कुछ-कुछ परिचित-सा लगा, पर वह ठीक से पहचान न सका। कुछ अँधेरा भी हो गया था। संदेह से उसने कहा, बता सकती हो, चंद्रमुखी कहाँ है?
स्त्री ने मंद-मंद मुस्कुराकर कहा, बता सकती हूँ; ऊपर चलो।
इस बार देवदास पहचान गया—हैं, तुम?
हाँ, मैं। देवदास, मुझे बिलकुल भूल गए?
ऊपर जाकर देवदास ने देखा, चंद्रमुखी काले पाड़ की धोती पहने है, पर वह मैली है। हाथों में
सिर्फ दो कंगन हैं, और कोई आभूषण नहीं। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। चकित होकर उसने कहा, तुम? अच्छी तरह से देखने पर पाया कि चंद्रमुखी पहले से बहुत दुबली हो गई है। बोला, क्या तुम्हारी तबीयत खराब थी?
चंद्रमुखी ने हँसकर कहा, शारीरिक तो ज़रा भी नहीं। तुम अच्छी तरह से बैठो।
देवदास ने शय्या पर बैठकर देखा कि कमरे का तो जैसे कायापलट ही हो गया है। गृहस्वामिनी की तरह उसकी भी दुर्दशा की कोई सीमा न थी। एक भी असबाब नहीं था—अलमारी, मेज़, कुर्सियों की जगह खाली पड़ी थी। बस एक शय्या थी; चादर मैली थी, दीवार पर से तस्वीरें हटा ली गई थीं, लोहे की कीलें अभी भी गड़ी थीं, एक-दो पर लाल फीते अब भी झूल रहे थे। ऊपर वह घड़ी अब भी ब्रैकेट पर थी, पर चुप थी। आसपास मकड़ियों ने अपने मन-माफ़िक जाले बुन रखे थे। एक कोने में एक तेल का दीया मंद-मंद प्रकाश बिखेर रहा था—उसी की सहायता से देवदास ने नए ढंग की गृह-सज्जा देख ली। कुछ चकित, कुछ क्षुब्ध होकर उसने कहा, चंद्रा, यह दुर्दशा कैसे हुई?
चंद्रमुखी ने फीकी-सी हँसी हँसकर कहा, दुर्दशा तुमसे किसने कहा? मेरा तो भाग्य खुल गया है।
देवदास समझ न सका; बोला, तुम्हारे शरीर के गहने भी कहाँ गए?
बेच डाले।
असबाब-पत्र?
वह भी बेच दिया।
घर की तस्वीरें भी बेच दीं?
इस बार चंद्रमुखी हँस पड़ी और सामने का एक घर दिखाकर बोली, उस घर की क्षेत्रमणि को दान में दे दिए।
देवदास कुछ देर तक उसके मुख की ओर देखता रहा, फिर बोला, चुनीबाबू कहाँ हैं?
कह नहीं सकती। दो महीने हुए, झगड़ा करके चले गए, फिर नहीं आए।
देवदास और भी चकित हुआ—झगड़ा क्यों?
चंद्रमुखी ने कहा, क्या झगड़ा नहीं होता?
होता है। पर क्यों?
दलाली करने आया था, इसलिए भगा दिया।
किस चीज़ की दलाली?
चंद्रमुखी ने हँसकर कहा, जूट की। फिर बोली, तुम समझते क्यों नहीं? एक बड़े आदमी को पकड़ लाया था, दो सौ रुपये महीना, ढेरों गहने, और दरवाज़े पर एक सिपाही। समझे?
देवदास समझकर हँस दिया, बोला, कहाँ, वह सब तो नहीं देख रहा?
होते तो देखते! मैंने उन्हें भगा दिया था।
उनका अपराध?
अपराध ज़्यादा कुछ नहीं था, पर मुझे अच्छा नहीं लगा। देवदास ने बहुत देर तक सोचकर कहा, उस दिन से यहाँ और कोई नहीं आया?
नहीं। उस दिन से क्या, तुम्हारे जाने के दूसरे दिन से ही यहाँ कोई नहीं आता। बस चुनी कभी-कभी आकर बैठता था, पर दो महीने से वह भी बंद है।
देवदास बिछौने पर लेट गया। अनमने भाव से बहुत देर तक मौन रहकर धीरे से बोला, चंद्रमुखी, तो दुकान-वुकान सब उठा दी?
हाँ—दिवालिया हो गई हूँ।
देवदास ने उस बात का उत्तर न देकर कहा, पर खाओगी कैसे?
अभी तो सुना कि कुछ गहने-वने थे, बेच दिए हैं।
वह और कितने दिन?
ज़्यादा नहीं। लगभग आठ-नौ सौ रुपये हैं मेरे पास। एक पंसारी के पास रख दिए हैं—वह मुझे बीस रुपये महीना देता है।
बीस रुपये में तो पहले तुम्हारा गुज़ारा नहीं होता था?
नहीं, आज भी ठीक से नहीं होता। तीन महीने का घर का किराया बाकी है, इसलिए सोच रही हूँ, हाथ के ये दो कंगन बेचकर, सारा हिसाब चुकाकर कहीं और चली जाऊँगी।
कहाँ जाओगी?
वह अभी तय नहीं किया। किसी सस्ते मुल्क में जाऊँगी—किसी गाँव-देहात में—जहाँ बीस रुपये में महीना कट जाए।
इतने दिन गई क्यों नहीं? यदि सचमुच तुम्हें और कुछ नहीं चाहिए तो इतने दिन व्यर्थ में क्यों उधार-कर्ज़ बढ़ाया?
चंद्रमुखी ने सिर झुकाए कुछ देर सोचा। अपने जीवन में यह बात कहने में आज उसे पहली बार लज्जा आई। देवदास बोला, चुप क्यों हो गई?
चंद्रमुखी शय्या के एक किनारे संकुचित-सी होकर बैठ गई और धीरे-धीरे बोली—नाराज़ मत होना; जाने से पहले आशा थी कि तुमसे भेंट हो जाए तो अच्छा हो। सोचती थी, तुम शायद एक बार और आओगे। आज तुम आ गए, अब कल ही जाने की तैयारी करूँगी। पर कहाँ जाऊँ, बता दोगे?
देवदास चकित होकर उठ बैठा; बोला, सिर्फ मुझसे मिलने की आस में? पर क्यों?
एक ख़याल। तुम मुझसे बड़ी घृणा करते थे। इतनी घृणा किसी ने कभी नहीं की, शायद इसीलिए। आज तुम्हें याद होगा या नहीं, मैं नहीं जानती, पर मुझे अच्छी तरह याद है—जिस दिन तुम यहाँ पहली बार आए, उसी दिन से तुम पर मेरी दृष्टि पड़ी थी। जानती थी कि तुम धनी की संतान हो; पर धन के लोभ में तुम्हारी ओर आकर्षित नहीं हुई थी। तुम्हारे पहले कितने ही लोग यहाँ आए-गए, पर किसी के भीतर कभी तेज नहीं देखा। और तुमने आते ही मुझे आघात पहुँचाया; एक अयाचित, उपयुक्त पर अनुचित रूखा व्यवहार; घृणा से मुँह फेरे रहे, अंत में मज़ाक की तरह कुछ देकर चले गए। ये सब याद है क्या?
देवदास चुप रहा। चंद्रमुखी फिर कहने लगी, उसी दिन से तुम पर नज़र रखने लगी। प्रेम से नहीं, घृणा से भी नहीं। जैसे कोई नई चीज़ देखने पर वह मन में बस जाती है, वैसे ही तुम्हें भी किसी तरह भूल नहीं पाती थी—तुम आते तो बड़े भय से सतर्क रहती, पर न आते तो कुछ भी अच्छा न लगता। उसके बाद फिर न जाने क्या मतिभ्रम हुआ—इन्हीं दो आँखों से बहुत-सी चीज़ें अब दूसरे ही रूप में देखने लगी। पहले की 'मैं' से इस तरह बदल गई—जैसे वह 'मैं' अब रही ही नहीं। उसके बाद तुमने शराब शुरू कर दी। मुझे शराब से बड़ी घृणा है। कोई शराबी होता तो उस पर बड़ा क्रोध आता। पर तुम जब नशे में होते तो क्रोध नहीं आता; पर दुःख बहुत होता था।—कहकर चंद्रमुखी ने देवदास के पैरों पर हाथ रखकर, छलकती आँखों से कहा, मैं बड़ी अधम हूँ, मेरा अपराध मत मानना। तुम कितनी ही बातें कहते, कितनी ही घृणा से मुझे हटा देते; पर मैं उतना ही तुम्हारे पास जाना चाहती थी। अंत में जब तुम सो जाते—खैर, वे सब बातें नहीं कहूँगी, शायद फिर नाराज़ हो जाओगे।
देवदास ने कुछ नहीं कहा—इस नए ढंग की बातों से उसे कुछ कष्ट हो रहा था। चंद्रमुखी ने चुपके से आँखें पोंछकर कहना जारी रखा, एक दिन तुमने कहा था—हम कितना सहते हैं। लांछना, अपमान—जघन्य अत्याचार, उपद्रव की बातें—उसी दिन से बड़ा अभिमान हुआ—मैंने सब बंद कर दिया।
देवदास उठकर बैठ गया और पूछा, पर दिन कैसे चलेंगे?
चंद्रमुखी ने कहा, वह तो पहले ही बता चुकी हूँ।
मान लो, वह तुम्हारे सारे पैसे हड़प ले तो—
चंद्रमुखी डरी नहीं। शांत, सहज भाव से बोली, कोई आश्चर्य नहीं, पर यह भी सोच रखा है। विपत्ति में पड़ूँगी तो तुमसे कुछ भिक्षा माँग लूँगी।
देवदास ने सोचकर कहा, वही लेना। अब कहीं और जाने की तैयारी करो।
कल ही करूँगी। कंगन बेचकर, एक बार उस पंसारी से मिलूँगी।
देवदास ने जेब से सौ-सौ के पाँच नोट निकालकर तकिये के नीचे रखते हुए कहा—कंगन मत बेचना, पर पंसारी से मिल लेना। लेकिन जाओगी कहाँ? किसी तीर्थस्थान पर?
नहीं देवदास। तीर्थ-धर्म पर मुझे उतना विश्वास नहीं। कलकत्ता से ज़्यादा दूर नहीं जाऊँगी, आसपास के किसी गाँव में जाकर रहूँगी।
क्या किसी भद्र परिवार में दासी का काम करोगी?
चंद्रमुखी की आँखों में फिर आँसू आ गए। पोंछकर बोली, मन नहीं मानता। स्वतंत्र रूप से आराम से रहूँगी। क्यों दुःख उठाने जाऊँगी? शरीर का दुःख कभी सहा नहीं, अब भी नहीं सह पाऊँगी। और ज़्यादा खींचातानी करने पर शायद टूट ही जाऊँगी।
देवदास ने विषादपूर्ण मुख से थोड़ा हँसकर कहा, लेकिन शहर के पास रहने पर शायद फिर प्रलोभन में पड़ जाओ—मनुष्य के मन का कोई विश्वास नहीं।
इस बार चंद्रमुखी का मुख प्रसन्न हो उठा। हँसकर बोली, यह बात सच है, मनुष्य के मन का कोई विश्वास नहीं, पर मैं अब प्रलोभन में नहीं पड़ूँगी। स्त्री का लोभ बहुत ज़्यादा होता है, यह भी मानती हूँ, पर जब लोभ की सारी चीज़ें अपनी इच्छा से त्याग रही हूँ तो अब मुझे कोई भय नहीं। यदि अचानक किसी झोंक में छोड़ती तो शायद सावधान रहने की आवश्यकता थी, पर इतने दिनों में एक दिन भी तो मुझे पछतावा नहीं हुआ। मैं तो बड़े सुख में हूँ।
फिर भी देवदास ने सिर हिलाया; कहा, स्त्री का मन बड़ा चंचल होता है—बड़ा अविश्वासी।
इस बार चंद्रमुखी बिलकुल पास आकर बैठ गई। हाथ पकड़कर बोली, देवदास!
देवदास ने उसके मुख की ओर देखा, अब वह यह नहीं कह सका—मुझे स्पर्श मत करो।
चंद्रमुखी ने स्नेह-विस्फारित नेत्रों से, किंचित कांपते कंठ से, उसके दोनों हाथ अपनी गोद में खींचकर कहा, आज अंतिम दिन है, आज और नाराज़ मत होना। एक बात तुमसे पूछने की बड़ी साध होती है।—यह कहकर वह क्षण-भर स्थिर दृष्टि से देवदास के मुख की ओर देखती रही, फिर कहा, पार्वती ने क्या तुम्हें बहुत गहरी चोट पहुँचाई है?
देवदास ने भृकुटि तान ली, बोला, यह बात क्यों?
चंद्रमुखी विचलित नहीं हुई। शांत, दृढ़ स्वर में बोली, मुझे काम है। तुमसे सच कह रही हूँ, तुम्हें दुःख होता है तो मुझे भी बहुत चुभता है। इसके अलावा, मैं शायद बहुत-सी बातें जानती हूँ। कभी-कभी नशे की धुन में तुम्हारे मुँह से बहुत-सी बातें सुनी हैं। पर फिर भी मुझे विश्वास नहीं होता कि पार्वती ने तुम्हें धोखा दिया है। बल्कि लगता है, तुमने खुद को ही धोखा दिया है। देवदास, मैं तुमसे उम्र में बड़ी हूँ, इस संसार में बहुत कुछ देखा है। जानते हो, मुझे क्या लगता है? मुझे निश्चय ही लगता है कि तुम्हारी ही भूल हुई है। लगता है, चंचल और अस्थिर चित्त के लिए स्त्री की जितनी बदनामी है, वे उतनी बदनामी की पात्र नहीं हैं। बदनाम भी तुम ही करते हो, तारीफ़ भी तुम ही करते हो। तुम्हें जो कहना होता है—तुम अनायास कह देते हो; पर वे ऐसा नहीं कर पातीं। अपने मन की बात प्रकट नहीं कर पातीं; कर भी पाती हैं तो सब समझते नहीं। क्योंकि वह बहुत अस्पष्ट होती है—तुम्हारी बातों के शोर में दब जाती है। उसके बाद बदनामी ही लोगों की ज़बान पर और स्पष्ट होकर चढ़ जाती है।
चंद्रमुखी थोड़ा रुककर, कंठ को और थोड़ा साफ़ करके कहने लगी, इस जीवन में प्रेम का व्यवसाय बहुत दिन किया है, पर प्रेम सिर्फ एक बार किया है। उस प्रेम का मूल्य बहुत है। बहुत कुछ सीखा है, जानते तो हो, प्रेम एक चीज़ है, और रूप का मोह दूसरी। इन दोनों में बड़ी गड़बड़ होती है, और पुरुष ही ज़्यादा गड़बड़ करते हैं। रूप का मोह तुम लोगों की अपेक्षा हममें शायद बहुत कम होता है, इसलिए हम एक ही क्षण में तुम्हारी तरह उन्मत्त नहीं हो उठतीं। तुम आकर जब प्रेम जताते हो, कितनी बातों में, कितने भावों से जब व्यक्त करते हो, हम चुप रहती हैं। कई बार तुम्हारे मन को ठेस पहुँचाने में लज्जा आती है, दुःख होता है, संकोच होता है। मुँह देखने से जब घृणा भी होती है, तब भी शायद लज्जा के कारण कह नहीं पातीं—मैं तुमसे प्रेम नहीं कर सकूँगी।
उसके बाद एक बाहरी प्रेम का अभिनय चलता है; एक दिन, जब वह समाप्त हो जाता है, तो पुरुष क्रोध से बेचैन होकर कहता है, कितनी बड़ी विश्वासघाती है! सब वही बात सुनते हैं, वही बात समझते हैं। हम तब भी चुप रहती हैं। मन को कितना कष्ट होता है, पर उसे देखने कौन जाता है?
देवदास ने कोई बात नहीं कही। वह भी कुछ देर चुपचाप उसके मुख की ओर देखती रही, फिर बोली, शायद एक ममता जन्म लेती है; स्त्री सोचती है, यही शायद प्रेम है! शांत, धीर भाव से संसार के कामकाज करती है, दुःख के समय प्राणपण से सहायता करती है, तुम लोग कितनी प्रशंसा करते हो—मुँह-दर-मुँह उसकी कितनी धन्य-धन्य होती है! पर शायद तब भी उसके लिए प्रेम का ककहरा भी शुरू नहीं हुआ होता।
उसके बाद यदि किसी अशुभ मुहूर्त में उसका हृदय असह्य वेदना से छटपटाकर बाहर आ खड़ा हो, तब—यह कहकर उसने देवदास के मुख की ओर तीव्र दृष्टि से देखकर कहा, तब तुम लोग चिल्ला उठते हो—कलंकिनी! छिः छिः!
अकस्मात् देवदास ने चंद्रमुखी के मुँह पर हाथ रखकर कहा—चंद्रमुखी, यह क्या!
चंद्रमुखी ने धीरे-धीरे हाथ हटाकर कहा, डरो मत देवदास, मैं तुम्हारी पार्वती की बात नहीं कह रही। यह कहकर वह मौन हो गई।
देवदास भी कुछ देर चुप रहकर अनमने-से भाव में बोला, पर कर्तव्य तो है! धर्म-अधर्म तो है!
चंद्रमुखी बोली, वह तो है ही। और है बलेइ, देवदास, जो सचमुच प्रेम करता है, वह सहन करता है। केवल मन-ही-मन प्रेम करके भी कितना सुख, कितनी तृप्ति है—जिसे यह पता चल जाता है, वह निरर्थक संसार के बीच दुःख-अशांति नहीं लाना चाहता। पर मैं क्या कह रही थी देवदास,—मैं निश्चय जानती हूँ, पार्वती ने तुम्हें एक बिंदु भी नहीं ठगा है, तुमने स्वयं को ठगा है। आज यह बात समझने की तुममें शक्ति नहीं है, मैं जानती हूँ; पर यदि कभी समय आया, तो शायद तुम देख पाओगे कि मैंने सच ही कहा था।
देवदास की दोनों आँखें आँसुओं से भर उठीं। आज न जाने कैसे उसे लगने लगा था कि चंद्रमुखी की बात ही सच है। यह आँसू चंद्रमुखी ने देख लिए, पर पोंछने का प्रयास नहीं किया। मन-ही-मन कहने लगी, तुम्हें मैंने कई बार कई तरह से देखा है, मैं तुम्हारा मन जानती हूँ। अच्छी तरह समझ गई हूँ कि साधारण पुरुषों की तरह तुम आगे बढ़कर प्रेम नहीं जता सकते। रही रूप की बात—रूप किसे अच्छा नहीं लगता?
लेकिन सिर्फ इसलिए तुम्हारा इतना बड़ा तेज रूप के चरणों में आत्म-विसर्जन कर देगा, यह बात किसी भी तरह विश्वास नहीं होती। पार्वती शायद बहुत रूपवती है; पर, फिर भी लगता है कि उसी ने तुमसे पहले प्रेम किया था, उसी ने पहले यह बात जताई थी।
मन-ही-मन कहते-कहते सहसा उसके मुँह से अस्फुट स्वर में निकल गया, अपने-आपसे ही समझ गई हूँ, वह तुमसे कितना प्रेम करती है!
देवदास जल्दी से उठकर बैठ गया, बोला, क्या कहा?
चंद्रमुखी बोली, कुछ नहीं। कह रही थी कि वह तुम्हारे रूप पर नहीं भूली। तुम्हारा रूप है अवश्य, पर उससे भूल नहीं होती। यह तीव्र, रूखा रूप सबकी आँखों में पड़ता भी नहीं। पर जिसकी आँखों में पड़ जाता है, वह फिर आँखें फेर नहीं पाता।—कहकर एक लंबी साँस लेकर बोली, तुम क्या आकर्षण हो, यह वही जानती है जिसने कभी तुमसे प्रेम किया है। इस स्वर्ग से अपनी इच्छा से लौट जाएगी, ऐसी स्त्री क्या इस पृथ्वी पर है!
फिर कुछ देर चुपचाप उसके मुख की ओर देखकर धीमे-धीमे कहने लगी,—यह रूप तो आँखों में नहीं समाता! इसकी गहरी छाया तो सीधे हृदय के बीचों-बीच पड़ती है। उसके बाद दिन समाप्त होने पर आग के साथ चिता में राख हो जाती है।
देवदास विह्वल दृष्टि से चंद्रमुखी के मुख की ओर देखकर बोला, आज यह सब तुम क्या कह रही हो?
चंद्रमुखी ने मंद-मंद मुस्कुराकर कहा, इससे बड़ी विपत्ति और कोई नहीं देवदास, कि जिससे हम प्रेम नहीं करते, वह ज़बरदस्ती प्रेम की बातें सुनाए! पर मैं तो सिर्फ पार्वती की वकालत कर रही थी—अपने लिए नहीं।
देवदास उठने को उद्यत होकर बोला, अब मैं चलता हूँ।
थोड़ी देर और बैठो। तुम्हें कभी होश में नहीं पाया, कभी इस तरह हाथ पकड़कर बात नहीं कर पाई—यह कैसी तृप्ति है! कहकर ही अचानक हँस पड़ी।
देवदास ने चकित होकर कहा, हँसी क्यों?
ओ कुछ नहीं, बस एक पुरानी बात याद आ गई। वह आज दस साल पुरानी बात है—जब मैं प्रेम करके घर से भाग आई थी। तब लगता था, कितना न प्रेम करती हूँ, शायद जान भी दे सकती हूँ। उसके बाद एक दिन एक तुच्छ-से गहने को लेकर हम दोनों में ऐसा झगड़ा हुआ कि फिर कभी किसी ने किसी का मुँह नहीं देखा। मन को सांत्वना दी कि वह मुझसे बिलकुल प्रेम नहीं करता था,—वरना एक गहना नहीं देता!
एक बार और चंद्रमुखी अपने-आप में हँस पड़ी। अगले ही क्षण शांत, गंभीर मुख से धीमे-धीमे बोली—धत् तेरे गहने की! तब क्या जानती थी कि एक मामूली सिर-दर्द मिटाने के लिए भी यह जान बिना सोचे-समझे दी जा सकती है! तब न समझती थी सीता-दमयंती की व्यथा, न विश्वास करती थी जगाई-मधाई की कहानी पर। अच्छा देवदास, इस जगत में सब कुछ संभव है, है न?
देवदास कुछ कह नहीं सका; हतबुद्धि-सा फटी-फटी आँखों से कुछ देर देखता रहा, फिर बोला, मैं जाता हूँ—
डरो मत, थोड़ी देर और बैठो। मैं अब तुम्हें और भरमाए रखना नहीं चाहती—मेरे वे दिन बीत गए। अब तुम भी मुझसे जितनी घृणा करते हो, मैं भी स्वयं से उतनी ही घृणा करती हूँ; पर देवदास, एक विवाह क्यों नहीं कर लेते?
इतनी देर में देवदास ने जैसे साँस ली; थोड़ा हँसकर बोला, करना तो चाहिए, पर मन नहीं करता।
न भी करे तो कर लो। बाल-बच्चों का मुँह देखकर भी बहुत शांति पाओगे। इसके अलावा मेरा भी एक उपाय हो जाएगा। तुम्हारी गृहस्थी में दासी की तरह रहकर भी आराम से दिन काट सकूँगी।
देवदास ने हँसकर कहा, अच्छा, तब तुम्हें बुला लाऊँगा।
चंद्रमुखी ने उसकी हँसी जैसे देखी ही नहीं; बोली, देवदास, एक बात और पूछने की इच्छा है।
क्या?
तुमने इतनी देर मेरे साथ बातें क्यों कीं?
कोई दोष हुआ है क्या?
वह मैं नहीं जानती। पर यह नया है! शराब पीकर सुध-बुध खोए बिना तो पहले कभी मेरा मुँह तक नहीं देखते थे!
देवदास ने उस प्रश्न का उत्तर न देकर विषादपूर्ण मुख से कहा, अब मदिरा छूना मना है—मेरे पिता की मृत्यु हुई है।
चंद्रमुखी बहुत देर तक करुण दृष्टि से देखती रही, फिर बोली, इसके बाद और पीओगे क्या?
कह नहीं सकता।
चंद्रमुखी ने उसके हाथ दोनों और खींचकर, अश्रु-व्याकुल स्वर में कहा, हो सके तो छोड़ देना, अकाल में ऐसे सोने-से प्राण नष्ट न करना।
देवदास सहसा उठ खड़ा हुआ और बोला, मैं चला। जहाँ भी जाओ, ख़बर देना—और यदि कभी किसी चीज़ की ज़रूरत हो, तो मुझसे संकोच मत करना।
चंद्रमुखी ने प्रणाम करके चरण-धूलि ली और बोली, आशीर्वाद दो कि सुखी होऊँ। और एक भिक्षा,—ईश्वर न करे, पर यदि कभी दासी की आवश्यकता हो, तो मुझे याद करना।
अच्छा।—कहकर देवदास चला गया। चंद्रमुखी ने हाथ जोड़कर रोते हुए कहा, भगवान! एक बार और भेंट हो जाए।
Comments (0)
Log in to join the conversation.