देवदास by Matribhasa Hindi
बारहवां परिच्छेद
दोनों भाई द्विजदास और देवदास तथा गाँव के बहुत-से लोग ज़मींदार नारायण मुखर्जी का अंतिम संस्कार करके घर लौट आए। द्विजदास चीख-चीखकर रोते हुए पागलों के समान हो गए हैं—मुहल्ले के पाँच लोग भी उन्हें संभाल नहीं पा रहे हैं। और देवदास शांत भाव से एक खंभे के पास बैठा है। मुँह में कोई शब्द नहीं, आँखों में एक बूँद आँसू नहीं। कोई उसे पकड़ नहीं रहा है—कोई सांत्वना देने का प्रयास नहीं कर रहा है। मधुसूदन घोष ने पास जाकर एक बार कहना चाहा था,—वह तो बेटा भाग्य में—
देवदास ने हाथ से द्विजदास की ओर इशारा करके कहा, "वहाँ।" घोष महाशय झेंपकर—"हाँ, वह तो वे—कितने बड़े आदमी थे," इत्यादि कहते हुए चले गए। और कोई पास नहीं आया। दोपहर बीतने पर देवदास अर्धमूर्च्छित जननी के चरणों के पास जाकर बैठ गया। वहाँ बहुत-सी स्त्रियाँ उन्हें घेरकर बैठी थीं। पार्वती की दादी भी उपस्थित थीं। उन्होंने रुंधे कंठ से सद्य-विधवा शोकार्त जननी को संबोधित करके कहा, "बहू, आँखें खोलकर देखो माँ, देवदास आया है।" देवदास ने पुकारा, "माँ।"
उन्होंने केवल एक बार देखकर कहा, "बेटा!" उसके बाद मूँदी हुई आँखों के कोरों से अजस्र अश्रु बहने लगे। स्त्रियों का दल स्वर में स्वर मिलाकर ज़ोर-ज़ोर से रो पड़ा। देवदास जननी के चरणों में कुछ देर मुँह छिपाए रहा; उसके बाद धीरे-धीरे उठकर चला गया। मृत पिता के शयनकक्ष में गया। आँखों में आँसू नहीं, गंभीर शांत मूर्ति। अपनी लाल आँखें ऊपर की ओर किए हुए ज़मीन पर बैठ गया। कोई भी उस मूर्ति को देखता तो शायद भयभीत हो जाता। माथे के दोनों ओर की नसें सूजी हुई थीं, बड़े-बड़े रूखे बाल बिखरे हुए थे। तप्त कांचन जैसा वर्ण कालिमा-युक्त हो गया था—कलकत्ते के जघन्य अत्याचारों के बाद यह दीर्घ रात्रि-जागरण, और उसके बाद पिता की मृत्यु! एक वर्ष पूर्व जिसने भी उसे देखा था—अब शायद वह उसे अचानक पहचान नहीं पाता। कुछ देर बाद पार्वती की जननी उसे खोजती हुई दरवाज़ा धकेलकर भीतर आईं—"देवदास!"
"क्यों चाची?"
"ऐसा करने से तो काम नहीं चलेगा बेटा!"
देवदास ने उनके चेहरे की ओर देखकर कहा, "मैंने क्या किया है चाची?"
चाची वह समझ गईं, किंतु उत्तर नहीं दे सकीं। देवदास का सिर अपनी गोद के पास खींचकर बोलीं,— "देवता—बेटा!"
"क्यों चाची?"
"देवता-चरण—बेटा—"
छाती के पास मुँह रखकर देवदास ने इस बार एक बूँद अश्रु विसर्जित किया।
शोकार्त परिवार के भी दिन कटते हैं। क्रमशः प्रभात हुआ, रोना-धोना बहुत कम हो गया। द्विजदास बिलकुल प्रकृतिस्थ हो गए हैं। उनकी जननी भी उठ बैठी हैं,—आँखें पोंछते-पोंछते दिन का कामकाज कर रही हैं। दो दिन बाद द्विजदास ने देवदास को बुलाकर कहा, "देवदास, पिता के श्राद्ध-कर्म में कितना व्यय करना उचित है?"
देवदास ने अग्रज के मुख की ओर देखकर कहा, "जैसा उचित विचारें।"
"नहीं भाई, अब केवल मेरे विचारने से नहीं चलेगा। तुम बड़े हो गए हो, तुम्हारा मत जानना भी आवश्यक है।"
देवदास ने पूछा, "कितने नक़द रुपये हैं?"
"पिताजी की तिजोरी में डेढ़ लाख रुपये जमा हैं। मेरे विचार से कोई दस हज़ार रुपये ख़र्च करने से पर्याप्त होगा—क्या कहते हो?"
"मुझे कितना मिलेगा?"
द्विजदास ने थोड़ा हिचकिचाकर कहा, "वह तो तुम्हें भी आधा मिलेगा। दस हज़ार ख़र्च हुए, तो तुम्हारे सत्तर हज़ार और मेरे सत्तर हज़ार बचेंगे।"
"माँ को क्या मिलेगा?"
"माँ नक़द रुपये का क्या करेंगी? वे घर की मालकिन हैं—हम उनका भरण-पोषण करेंगे।"
देवदास ने थोड़ा सोचकर कहा, "मेरे विचार से, आपके हिस्से के पाँच हज़ार रुपये ख़र्च हों और मेरे हिस्से के पच्चीस हज़ार रुपये ख़र्च होंगे। बाक़ी पचास हज़ार में से मैं पच्चीस हज़ार लूँगा, और शेष पच्चीस हज़ार रुपये माँ के नाम जमा रहेंगे। आपका क्या विचार है?"
पहले द्विजदास मानो लज्जित हुए; फिर बोले, "उत्तम बात है। परंतु मेरा, क्या है कि,—स्त्री, पुत्र, कन्या हैं; उनका विवाह, यज्ञोपवीत संस्कार,—बहुत ख़र्च है। तो यही परामर्श ठीक है।" थोड़ा रुककर बोले, "तो थोड़ा लिख भर देने से—लिखा-पढ़ी की आवश्यकता होगी क्या? यह काम अच्छा नहीं दिखेगा। मेरी इच्छा है कि रुपये-पैसे की बात—इस समय गुप्त ही रहे।"
"वह तो अच्छी बात है; परंतु क्या है न भाई—"
"अच्छा, मैं लिखकर ही दिए देता हूँ।" उसी दिन देवदास ने लिखा-पढ़ी कर दी।
अगले दिन दोपहर को देवदास नीचे उतर रहा था, सीढ़ियों के पास पार्वती को देखकर ठिठककर खड़ा हो गया। पार्वती उसी के चेहरे की ओर देख रही थी—पहचानने में मानो उसे क्लेश हो रहा हो। देवदास ने गंभीर और शांत मुख से पास आकर कहा, "कब आईं पार्वती?"
वही कंठस्वर! आज तीन वर्ष बाद भेंट। नतमस्तक पार्वती ने कहा—"सुबह के समय आई हूँ।"
"बहुत दिनों से भेंट नहीं हुई। बिल्कुल ठीक तो थीं?"
पार्वती ने सिर हिलाया।
"चौधरी महाशय ठीक हैं? बच्चे सब ठीक हैं?"
"सब ठीक हैं।" पार्वती ने एक बार चेहरे की ओर आँख उठाकर देखा। परंतु एक बार भी पूछ न सकी कि वे कैसे हैं—क्या कर रहे हैं। अब तो कोई प्रश्न ही नहीं फबता।
देवदास ने कहा, "अभी कुछ दिन तो हो न?"
"हाँ।"
"तो फिर क्या—" कहकर देवदास बाहर चला गया।
श्राद्ध समाप्त हो गया है। वह बात कहने चलें तो बहुत कुछ लिखना पड़ेगा, इसलिए उसकी कोई आवश्यकता नहीं। श्राद्ध के अगले दिन पार्वती ने धर्मदास को एकांत में बुलाकर उसके हाथ में एक सोने का हार देते हुए कहा, "धर्म, अपनी बेटी को पहनने के लिए देना—"
धर्मदास ने उसके चेहरे की ओर देखकर अपनी आर्द्र आँखें और भी आर्द्र करते हुए कहा, "अहा, तुम्हें कितने दिनों से नहीं देखा; सब कुशल-मंगल तो है न दीदी?"
"सब कुशल है। तुम्हारे बाल-बच्चे ठीक हैं?"
"हाँ, ठीक हैं पारू।"
"तुम ठीक हो?"
इस बार एक लंबी साँस छोड़कर धर्मदास बोला, "कहाँ अब ठीक हूँ! अब तो चले जाने की इच्छा होती है—मालिक चले गए।" धर्मदास शोक के आवेग में जाने क्या-क्या कहता, किंतु पार्वती ने उसे रोक दिया। ये सब समाचार सुनने के लिए उसने हार नहीं दिया था।
पार्वती बोल उठी, "यह क्या बात हुई धर्म, तुम चले गए तो देवदा को कौन देखेगा?"
धर्मदास ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा, "जब बच्चा था, तब देखा था। अब न देखना पड़े तो बचूँ, पारू।"
पार्वती और समीप खिसककर आई और बोली, "धर्म, एक बात सच-सच बताओगे?"
"क्यों नहीं बताऊँगा दीदी!"
"तो सच-सच बताओ, देवदा अब क्या करते हैं?"
"करते हैं मेरा सिर और मुँड।"
"धर्मदास, खुलकर बताओ न?"
धर्मदास ने फिर से माथे पर हाथ मारा और बोला, "खुलकर और क्या बताऊँ दीदी! क्या यह कोई कहने की बात है! इस बार मालिक नहीं रहे, देवता के हाथ में अथाह रुपया आ गया; अब क्या कोई रक्षा हो पाएगी?"
पार्वती का मुख एकदम म्लान हो गया। उसने इशारों-इशारों में कुछ-कुछ सुना था। सूखकर बोली, "क्या कहते हो धर्मदास?" उसने मनोरमा के पत्र में जब कुछ-कुछ सुना था, तब विश्वास नहीं कर सकी थी। धर्मदास सिर हिलाते हुए कहने लगा—"आहार नहीं, निद्रा नहीं, केवल बोतल-बोतल शराब। तीन दिन, चार दिन तक कहाँ पड़ा रहता है—कोई ठिकाना नहीं। कितने ही रुपये उड़ा दिए,—सुनने में आता है, न जाने कितने हज़ार रुपयों के गहने उसे गढ़वाकर दे दिए हैं।"
पार्वती सिर से पाँव तक काँप उठी—"धर्मदास, यह सब सच है?"
धर्मदास अपने ही मन में कहने लगा,—"तेरी बात शायद सुन ले—एक बार मना कर दे। क्या शरीर क्या हो गया—इस तरह के अत्याचार से कितने दिन ही बचेगा? किससे भला यह बात कहूँ? माँ, बाप, भाई—इनसे यह बात कही नहीं जा सकती।" धर्मदास सिर पर बार-बार हाथ मारते हुए बोल उठा, "इच्छा होती है, सिर पटककर मर जाऊँ पारू, अब जीने की साध नहीं।"
पार्वती उठकर चली गई। नारायण बाबू की मृत्यु का समाचार पाकर वह दौड़ी आई थी। सोचा था, इस विपत्ति के समय एक बार देवदास के पास जाना उचित है। परंतु, उसके इतने साधों का देवदा यह हो गया है! न जाने कितनी ही बातें याद आने लगीं, उनका कोई अंत नहीं था। जितनी धिक्कार उसने देवदास को दी, उसकी हज़ार गुना उसने अपने-आपको दी; हज़ारों बार उसे लगा कि यदि वह होती तो क्या ऐसा हो सकता था? पहले ही उसने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली थी, किंतु, वह कुल्हाड़ी अब उसके सिर पर पड़ी है। उसका देवदा ऐसा होता जा रहा है—इस तरह नष्ट हो रहा है, और वह दूसरों की गृहस्थी सँवारने के लिए व्याकुल है! दूसरों को अपना समझकर वह रोज़ अन्न बाँट रही है, और उसका सर्वस्व,—आज भूखों मर रहा है! पार्वती ने प्रतिज्ञा की, आज वह देवदास के पैरों पर सिर पटककर मर जाएगी!
अभी संध्या होने में कुछ विलंब था,—पार्वती ने आकर देवदास के कमरे में प्रवेश किया। देवदास शय्या पर बैठा हिसाब देख रहा था, उसने नज़र उठाकर देखा। पार्वती ने धीरे-धीरे दरवाज़ा बंद किया और फर्श पर बैठ गई। देवदास ने सिर उठाकर हँसा। उसका मुख विषण्ण था, परंतु शांत। अचानक परिहास करते हुए बोला, "अगर कलंक लगा दूँ तो?"
पार्वती ने अपनी सलज्ज, नीले कमल जैसी दोनों आँखें एक बार उसकी ओर कीं, और अगले ही क्षण झुका लीं। एक ही क्षण में उसने समझा दिया कि यह बात उसकी छाती के बीच चिरकाल के लिए शूल की तरह बिंधी हुई है। अब और क्या? कितनी ही बातें कहने आई थी, सब भूल गई। देवदास के सामने वह बात नहीं कह सकती।
देवदास फिर हँस पड़ा; बोला, "समझ गया रे, समझ गया! लज्जा आ रही है, न?"
फिर भी पार्वती बात न कर सकी। देवदास कहने लगा, "उसमें अब लज्जा क्या? दोनों ने मिल-जुलकर एक बचपना कर डाला—अब यह देख तो——बीच में क्या गड़बड़ हो गई। क्रोध में आकर तूने जो जी में आया कह दिया; मैंने भी माथे पर वह दाग़ दे दिया। कैसा हुआ न!"
देवदास की बातों में श्लेष या व्यंग्य का लेशमात्र भी नहीं था; प्रसन्न हँसते-हँसते मुख से अतीत के दु:खों की कहानी। परंतु पार्वती की छाती फटी जा रही थी। मुँह में कपड़ा दबाए, श्वास रोके हुए उसने मन-ही-मन कहा, 'देवदा, वह दाग़ ही मेरी सांत्वना है, वही मेरा संबल है। तुम मुझसे प्रेम करते थे—इसीलिए दया करके, हमारा बाल-इतिहास ललाट पर लिख दिया है। वह मेरी लज्जा नहीं, कलंक नहीं, मेरी गौरव की सामग्री है।'
"पारू!"
मुँह से पल्लू बिना हटाए पार्वती ने कहा, "क्या?"
"मुझे तुझ पर बड़ा क्रोध आता है—"
इस बार देवदास का कंठस्वर विकृत होने लगा—"पिताजी नहीं रहे, आज मेरा कैसा दु:ख का दिन है; किंतु तू होती तो क्या चिंता थी! बड़ी बहू को जानती ही है, दादा का स्वभाव भी तुझसे कुछ छिपा नहीं है; बता भला, माँ को लेकर इस समय क्या करूँ! और मेरा ही अब क्या होगा, कुछ भी समझ नहीं पाता। तू होती तो निश्चिंत होकर—सब तेरे हाथों में सौंपकर—वह क्या रे पारू!"
पार्वती सुबककर रो पड़ी।
देवदास ने कहा, "रो रही है क्या? तब तो अब कहना ही नहीं हुआ।"
पार्वती ने आँखें पोंछते-पोंछते कहा, "कहो।"
देवदास ने पल-भर में अपना कंठस्वर साफ़ करके कहा, "पारू, तू क्या बहुत पक्की गृहिणी हो गई है रे?"
भीतर-ही-भीतर पार्वती ने अपने होंठ चबा लिए; मन-ही-मन बोली, 'ख़ाक गृहिणी! सेमल का फूल क्या देव-सेवा में लगता है?'
देवदास हँस पड़ा; हँसकर बोला—"बड़ी हँसी आती है! थी तू इतनी-सी—कितनी बड़ी हो गई। बड़ा घर, बड़ी ज़मींदारी, बड़े-बड़े बाल-बच्चे—और चौधरी महाशय, सभी बड़े—क्यों रे पारू!"
चौधरी महाशय पार्वती के बड़े विनोद की वस्तु थे; उन्हें याद आते ही उसे हँसी आ जाती थी। इतने कष्ट में भी इसलिए उसे हँसी आ गई।
देवदास ने कृत्रिम गांभीर्य के साथ कहा, "एक उपकार कर सकती है?"
पार्वती ने मुँह उठाकर कहा, "क्या?"
"तुम्हारे देश में अच्छी लड़की मिलती है?"
पार्वती ने थूक निगलकर, खाँसकर कहा—"अच्छी लड़की? क्या करोगे?"
"मिले तो ब्याह कर लूँ। एक बार संसारी होने की साध होती है।"
पार्वती ने भली मानुस की तरह कहा, "बहुत सुंदरी न?"
"हाँ, तेरे जैसी।"
"और बहुत भली मानुस?"
"नहीं, बहुत भली मानुस से काम नहीं—बल्कि थोड़ी नटखट,—तेरी तरह जो मुझसे झगड़ा कर सके।"
पार्वती ने मन-ही-मन कहा, 'वह तो कोई नहीं कर सकेगी देवदा; क्योंकि उसके लिए मेरी तरह प्रेम कर सकना चाहिए।' मुँह से कहा, "जला मुँह मेरा, मुझ जैसी न जाने कितनी हज़ार तुम्हारे चरणों में आ सकें तो धन्य हो जाएँ।"
देवदास ने कौतुक करते हुए हँसकर कहा, "एक तो फ़िलहाल दे सकती है दीदी?"
"देवदा, सचमुच ब्याह करोगे?"
"यही तो कहा मैंने।"
केवल यही उसने खुलकर नहीं कहा कि उसके बिना इस जीवन में किसी अन्य स्त्री में उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी।
"देवदा, एक बात कहूँ?"
"क्या?"
पार्वती ने स्वयं को थोड़ा सँभालते हुए कहा, "तुमने शराब पीना क्यों सीखा?"
देवदास हँस पड़ा; बोला, "पीने के लिए क्या कोई चीज़ सीखनी पड़ती है?"
"वह नहीं, अभ्यास क्यों किया?"
"किसने कहा, धर्मदास ने?"
"कोई भी कहे, बात क्या सच है?"
देवदास ने छल नहीं किया; कहा, "कुछ हद तक है।"
पार्वती कुछ देर स्तब्ध बैठी रही, फिर पूछा, "और कितने हज़ार रुपयों के गहने गढ़वाकर दे दिए हैं, न?"
देवदास ने हँसकर कहा, "दिए नहीं हैं, गढ़वाकर रखे हैं। तू लेगी?"
पार्वती ने हाथ फैलाकर कहा, "दो। यह देखो, मेरे पास एक भी गहना नहीं है।"
"चौधरी महाशय ने तुझे नहीं दिए?"
"दिए थे; मैंने सब उनकी बड़ी बेटी को दे दिए।"
"तुझे क्या आवश्यकता नहीं है?"
पार्वती ने सिर हिलाकर मुँह नीचा कर लिया।
इस बार सचमुच देवदास की आँखों में आँसू आ रहे थे। देवदास भीतर-ही-भीतर समझ गया था, कोई स्त्री कम दु:ख में अपने गहने उतारकर बाँट नहीं देती। किंतु आँखों के आँसू छिपाकर धीरे-धीरे बोला, "झूठी बात है, पारू। किसी भी स्त्री से मैंने प्रेम नहीं किया, किसी को भी गहने नहीं दिए।"
पार्वती ने लंबी साँस छोड़कर मन-ही-मन कहा, 'यही मैं विश्वास करती हूँ।'
बहुत देर तक दोनों ही चुप रहे। उसके बाद पार्वती ने कहा, "परंतु, प्रतिज्ञा करो—अब शराब नहीं पिओगे!"
"वह नहीं कर सकता। क्या तुम प्रतिज्ञा कर सकती हो, कि मुझे अब एक बार भी याद नहीं करोगी?"
पार्वती ने कोई बात नहीं कही। इसी समय बाहर संध्या की शंखध्वनि हुई। देवदास चौंककर खिड़की के बाहर देखकर बोला, "संध्या हो गई, अब घर जा पारू!"
"मैं नहीं जाऊँगी। तुम प्रतिज्ञा करो।"
"मैं नहीं कर सकता।"
"क्यों नहीं कर सकते?"
"क्या सभी सब काम कर सकते हैं?"
"इच्छा करें तो निश्चय ही कर सकते हैं।"
"क्या तुम आज रात मेरे साथ भागकर जा सकती हो?"
पार्वती का सहसा मानो हृदय-स्पंदन रुक गया। अज्ञात रूप से अस्फुट स्वर में उसके मुँह से निकल गया, "वह क्या हो सकता है?"
देवदास ने शय्या पर थोड़ा खिसककर बैठते हुए कहा, "पार्वती, दरवाज़ा खोल दो।"
पार्वती खिसककर आई, और दरवाज़े से पीठ सटाकर अच्छी तरह बैठते हुए बोली, "प्रतिज्ञा करो!"
देवदास उठकर खड़ा हो गया और धीर भाव से कहने लगा—"पारू, ज़ोर-ज़बर्दस्ती से प्रतिज्ञा करवाना क्या अच्छा है, या, उससे कोई विशेष लाभ है? आज की प्रतिज्ञा कल शायद न रहे—क्यों मुझे अब और झूठा बनाएगी?"
फिर बहुत देर नि:शब्द ही बीत गई। ऐसे समय में कहाँ, न जाने किस कमरे की घड़ी में टन्-टन् करके नौ बज गए। देवदास व्यग्र हो उठा; बोला, "अरी पारू, दरवाज़ा खोल दे—"
पार्वती बात नहीं कहती।
"ओ पारू—"
"मैं किसी भी तरह नहीं जाऊँगी," कहकर पार्वती अकस्मात् रुंधे हुए आवेग से वहीं लोट गई—और बहुत देर तक ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। कमरे के भीतर अब गाढ़ा अंधकार था—कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। देवदास ने केवल अनुमान से समझा कि पार्वती ज़मीन पर गिरकर रो रही है। धीरे-धीरे पुकारा—"पारू!"
पार्वती ने रोते हुए उत्तर दिया, "देवदा, मुझे बड़ा कष्ट है!"
देवदास पास खिसककर आया। उसकी आँखों में भी जल था—किंतु, स्वर विकृत नहीं होने पाया। बोला, "वह क्या अब मैं जानता नहीं रे?"
"देवदा, मैं तो मरी जा रही हूँ। कभी तुम्हारी सेवा करने को नहीं पा सकी—मेरी तो यह आजन्म की साध है—"
अंधकार में आँखें पोंछकर देवदास ने कहा—"उसका भी तो समय है।"
"तो मेरे पास चलो; यहाँ तुम्हें देखने वाला कोई नहीं है!"
"तेरे घर जाऊँगा तो बहुत जतन करेगी?"
"मेरी बचपन की साध! स्वर्ग के देवता! मेरी यह साध पूरी कर दो! उसके बाद मर भी जाऊँ—तो भी दु:ख नहीं।"
इस बार देवदास की आँखों में भी जल आ गया।
पार्वती ने फिर से कहा, "देवदा, मेरे घर चलो।"
देवदास ने आँखें पोंछकर कहा, "अच्छा, जाऊँगा।"
"मुझे छूकर कहो, जाओगे?"
देवदास ने अनुमान करके पार्वती के चरण-प्रांत का स्पर्श करके कहा, "यह बात कभी नहीं भूलूँगा। मेरी देखभाल करने से यदि—तुम्हारा दु:ख मिटता है—तो मैं जाऊँगा। मरने से पहले भी मुझे यह बात स्मरण रहेगी।"
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