देवदास লিখেছেন Matribhasa Hindi
आठवाँ परिच्छेद
सतर्क और अनुभवी लोगों का स्वभाव है कि वे पलक झपकते ही किसी वस्तु के गुण-दोष के विषय में कोई दृढ़ मत प्रकट नहीं करते—बिना पूरी तरह विचार किए, पूरी धारणा नहीं बना लेते; दो पहलू देखकर चारों ओर की बात नहीं करते। किंतु एक और तरह के लोग भी होते हैं, जो ठीक इसके उलटे होते हैं। किसी भी चीज़ पर देर तक सोचने का धैर्य इनमें नहीं होता, कुछ भी हाथ पड़ते ही ये तय कर लेते हैं—यह अच्छा है या बुरा; गहराई में उतरकर देखने का परिश्रम ये विश्वास के ज़ोर पर ही चला लेते हैं। ऐसा नहीं कि इस तरह के लोग संसार में कोई काम नहीं कर पाते, बल्कि कई बार वे अधिक काम कर जाते हैं। यदि भाग्य सुप्रसन्न हो तो वे उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर दिखाई देते हैं। और यदि न हो तो अवनति की गहरी कंदरा में सदा के लिए जा पड़ते हैं; फिर उठ नहीं पाते, बैठ नहीं पाते, फिर प्रकाश की ओर ताककर नहीं देखते; निश्चल, मृत जड़-पिंड की भाँति पड़े रहते हैं। देवदास इसी श्रेणी का मनुष्य है।
दूसरे दिन प्रातःकाल वह घर आ पहुँचा। माँ ने चकित होकर कहा, "देवा, क्या कॉलेज की फिर छुट्टी हो गई?"
देवदास 'हाँ' कहकर अनमने भाव से चला गया। पिता के पूछने पर भी उसने ऐसा ही कोई जवाब देकर टाल दिया और खिसक गया। वे ठीक से समझ न पाए, सो उन्होंने अपनी गृहिणी से पूछा। उन्होंने बुद्धि लड़ाकर कहा, "गर्मी अभी कम नहीं हुई है, इसीलिए फिर छुट्टी हो गई है।"
दो-एक दिन देवदास छटपटाता फिरा। क्योंकि जो वह चाहता था, वह नहीं हो रहा था—पार्वती से एकांत में भेंट ही नहीं हो पा रही थी। दो दिन बाद पार्वती की जननी ने देवदास को सामने पाकर कहा, "बेटा, जब आ ही गए हो तो पारो के ब्याह तक रुक जाओ।"
देवदास ने कहा, "अच्छा।"
दोपहर में भोजन आदि के बाद पार्वती नित्य बाँध पर जल भरने जाती थी। आज भी वह काँख में पीतल की गगरी लेकर घाट पर आ खड़ी हुई; देखा कि थोड़ी ही दूर एक बेर के पेड़ की ओट में देवदास पानी में बंसी डाले बैठा है। एक बार मन में आया कि लौट जाए; एक बार मन में आया कि चुपचाप जल भरकर चली जाए; पर जल्दी में वह कोई भी काम न कर सकी। गगरी को घाट पर रखते हुए शायद कुछ आहट हुई और देवदास ने मुड़कर देखा। फिर हाथ हिलाकर बुलाते हुए कहा, "पारो, ज़रा सुनकर जाओ।"
पार्वती धीरे-धीरे पास जाकर खड़ी हो गई। देवदास ने बस एक बार मुँह उठाया, उसके बाद बहुत देर तक शून्य दृष्टि से जल की ओर ताकता रहा।
पार्वती ने कहा, "देवदा, मुझसे कुछ कहेंगे?"
देवदास ने किसी ओर देखे बिना कहा, "हूँ,—बैठो।" पार्वती बैठी नहीं, मुँह झुकाए खड़ी रही। किंतु कुछ देर तक जब कोई बात न हुई, तब पार्वती एक-एक क़दम कर धीरे-धीरे घाट की ओर लौटने लगी। देवदास ने एक बार मुँह उठाकर देखा; फिर दोबारा जल पर दृष्टि गड़ाकर कहा, "सुनो।"
पार्वती लौट आई; किंतु जब उसने देखा कि देवदास फिर भी कुछ कह नहीं पा रहा है, तो वह दुबारा लौट गई। देवदास निस्तब्ध बैठा रहा। थोड़ी देर बाद उसने मुड़कर देखा, पार्वती जल लेकर जाने की तैयारी कर रही है। तब वह बंसी समेटकर घाट के पास आ खड़ा हुआ; बोला, "मैं आया हूँ।"
पार्वती ने घड़ा नीचे रख दिया, कोई बात नहीं की।
"मैं आया हूँ, पारो!"
पार्वती कुछ क्षण चुप रहकर, अंत में अत्यंत धीमे स्वर में बोली, "क्यों?"
"तुमने ही तो आने को लिखा था, याद नहीं?"
"नहीं।"
"यह क्या पारो! उस रात की बात याद नहीं?"
"याद है। लेकिन अब उस बात का क्या काम?"
उसका कंठस्वर स्थिर था, पर अत्यंत रूखा। लेकिन देवदास उसका मर्म न समझ सका; बोला, "मुझे माफ़ कर दो, पारो। मैं तब इतना समझ नहीं पाया था।"
"चुप रहो। ये सब बातें मुझे सुनना भी अच्छा नहीं लगता।"
"मैं जैसे भी हो, माँ-बाप को राज़ी करूँगा। बस तुम—"
पार्वती ने देवदास के मुँह की ओर एक बार तीक्ष्ण दृष्टि से देखकर कहा, "तुम्हारे माँ-बाप हैं, मेरे नहीं हैं? उनकी राय की कोई ज़रूरत नहीं?"
देवदास लज्जित होकर बोला, "सो तो है ही पारो, पर वे तो मना नहीं करेंगे,—बस तुम—"
"कैसे जाना कि वे मना नहीं करेंगे? वे पूरी तरह विरुद्ध हैं।"
देवदास ने हँसने का व्यर्थ प्रयास करके कहा—"नहीं जी, वे ज़रा भी मना नहीं करेंगे—यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ। बस तुम—"
पार्वती ने बात के बीच में ही तीव्र कंठ से कहा, "बस मैं! तुम्हारे साथ? छिः—"
पलक झपकते ही देवदास की दोनों आँखें आग की तरह जल उठीं। उसने कठोर स्वर में कहा, "पार्वती! क्या मुझे भूल गई?"
पहले तो पार्वती सकपका गई; पर तुरंत ही स्वयं को सँभालकर शांत, कठोर स्वर में उत्तर दिया, "नहीं, भूलूँगी क्यों? बचपन से तुम्हें देखती आ रही हूँ, जब से होश सँभाला है, तुमसे डरती आई हूँ—तो क्या तुम मुझे डराने आए हो? पर क्या तुम मुझे ही नहीं पहचानते?" यह कहकर वह निडर आँखें उठाकर खड़ी हो गई।
पहले तो देवदास के मुँह से बात न निकली; फिर बोला, "हमेशा मुझसे डरती ही आई हो,—और कुछ नहीं?"
पार्वती ने दृढ़ स्वर में कहा, "नहीं, और कुछ भी नहीं।"
"सच कह रही हो?"
"हाँ, सच कह रही हूँ। तुम पर मुझे तनिक भी विश्वास नहीं है। मैं जिनके पास जा रही हूँ, वे धनवान हैं, बुद्धिमान हैं—शांत और स्थिर हैं। वे धार्मिक हैं। मेरे माँ-बाप मेरा मंगल चाहते हैं; इसलिए वे तुम्हारे जैसे एक अज्ञानी, चंचल-चित्त और उद्दंड व्यक्ति के हाथों में मुझे कदापि नहीं सौंपेंगे। तुम रास्ता छोड़ो।"
एक बार देवदास थोड़ा हिचकिचाया, एक बार मानो थोड़ा रास्ता छोड़ने को उद्यत भी हुआ, किंतु अगले ही क्षण दृढ़ता से मुँह उठाकर बोला—"इतना अहंकार!"
पार्वती बोली, "क्यों न हो? तुम कर सकते हो, मैं नहीं कर सकती? तुम्हारे पास रूप है, गुण नहीं—मेरे पास रूप भी है और गुण भी। तुम बड़े लोग हो, पर मेरे पिता भी भीख नहीं माँगते फिरते। इसके अलावा, दो दिन बाद मैं भी तुमसे किसी भी मामले में हीन नहीं रहूँगी, यह जानते हो?"
देवदास अवाक् रह गया।
पार्वती फिर बोल उठी—"तुम सोच रहे हो कि मेरा बहुत नुक़सान करोगे। बहुत न सही, कुछ नुक़सान कर सकते हो, यह मैं जानती हूँ। अच्छा, वही करो। बस मेरा रास्ता छोड़ दो।"
देवदास हतबुद्धि होकर बोला, "नुक़सान कैसे करूँगा?"
पार्वती ने तत्काल उत्तर दिया—"अपवाद देकर। जाओ, वही करो।"
यह बात सुनकर देवदास वज्राहत-सा देखता रह गया। उसके मुँह से केवल इतना निकला—"मैं दूँगा अपवाद!"
पार्वती विष की तरह थोड़ी-सी क्रूर हँसी हँसकर बोली, "जाओ, जाते-जाते मेरे नाम एक कलंक भी फैलाते जाओ; कि उस रात मैं तुम्हारे पास अकेली गई थी, यही बात चारों ओर प्रचारित कर दो। मन को बड़ी सांत्वना मिलेगी!" यह कहकर पार्वती के दर्प भरे, क्रुद्ध होंठ काँप-काँपकर रुक गए।
किंतु देवदास का सीना क्रोध और अपमान से ज्वालामुखी की तरह धधक उठा। उसने अव्यक्त स्वर में कहा, "झूठी बदनामी फैलाकर मैं मन में सांत्वना पाऊँगा? और अगले ही क्षण उसने बंसी के मोटे बेंट को ज़ोर से घुमाकर पकड़ते हुए भीषण कंठ से कहा, "सुन पार्वती, इतना रूप होना अच्छा नहीं। अहंकार बहुत बढ़ जाता है।" फिर गला थोड़ा धीमा करके बोला, "देखती नहीं, चाँद में इतना रूप है इसीलिए तो उसमें कलंक का काला दाग़ है; कमल इतना श्वेत है इसीलिए तो उस पर काला भौंरा बैठता है। आओ, तुम्हारे मुख पर भी कलंक का कुछ चिह्न लगा दूँ।"
देवदास के धैर्य की सीमा टूट चुकी थी। उसने दृढ़ मुट्ठी से बंसी का बेंट घुमाकर ज़ोर से पार्वती के माथे पर प्रहार किया; और उसके माथे पर बाईं भौंह के नीचे तक एक चीरा लग गया। पलक झपकते ही सारा मुँह रक्त से नहा गया।
पार्वती ज़मीन पर गिरकर बोली, "देवदा, यह क्या किया!"
देवदास बंसी के टुकड़े-टुकड़े कर पानी में बहाते-बहाते स्थिर भाव से उत्तर दिया, "कुछ ज़्यादा नहीं, बस ज़रा-सा कट गया है।"
पार्वती आकुल कंठ से रो उठी—"ओ देवदा!"
देवदास ने अपनी पतली कमीज़ का एक टुकड़ा फाड़कर, उसे पानी में भिगोकर पार्वती के माथे पर बाँधते-बाँधते कहा, "डर क्या है पारो! यह घाव जल्दी ही भर जाएगा—बस निशान रह जाएगा। यदि कोई कभी इस बारे में पूछे तो झूठ बोल देना; नहीं तो, सच बोलकर अपना कलंक स्वयं ही प्रकट कर देना।"
"ओ माँ!—"
"छिः, ऐसा नहीं करते पारो। अंतिम विदा के दिन बस याद रखने लायक एक छोटी-सी निशानी छोड़ गया। ऐसा सोने-सा मुख आईने में कभी-कभी देखोगी तो?" यह कहकर उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही वह चलने को उद्यत हुआ।
पार्वती व्याकुल होकर रो पड़ी, "देवदादा!"
देवदास लौट आया। आँखों के कोने में एक बूँद आँसू।
बड़े स्नेह-सने कंठ से बोला, "क्यों रे पारो?"
"किसी से कहना मत।"
देवदास पल-भर में झुककर पार्वती के बालों पर अपने होंठ रखकर बोला, "छिः—तू क्या मुझसे पराई है पारो? तुझे याद नहीं, बचपन में शरारत करने पर मैंने कितनी ही बार तेरे कान उमेठे हैं।"
"देवदादा—मुझे माफ़ कर दो।"
"यह तुझे कहने की ज़रूरत नहीं, बहन। क्या सचमुच, पारो, मुझे बिल्कुल भूल गई है? मैंने तुझ पर कब क्रोध किया था? कब माफ़ नहीं किया?"
"देवदादा—"
"पार्वती, तुम तो जानती हो, मैं ज़्यादा बातें नहीं कर सकता; ज़्यादा सोच-विचारकर काम भी नहीं कर सकता। जब जो मन में आता है, कर डालता हूँ।" यह कहकर देवदास ने पार्वती के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए कहा, "तुमने अच्छा ही किया। मेरे पास तुम सुख तो न पातीं; पर तुम्हारे इस देवदा का अक्षय स्वर्गवास हो जाता।"
इसी समय बाँध के दूसरी ओर कुछ लोग आ रहे थे। पार्वती धीरे-धीरे जल में उतर गई। देवदास चला गया। पार्वती जब घर लौटी, तब शाम ढल चुकी थी। ठकुमाँ ने बिना देखे ही कहा, "पारो, क्या तू पोखर खोदकर पानी ला रही है, दीदी!"
किंतु उनके मुँह की बात मुँह में ही रह गई। पार्वती के मुख की ओर देखते ही वे चीख़ उठीं, "ओ माँ! यह सर्वनाश कैसे हुआ?"
घाव से तब भी रक्त बह रहा था; कपड़े का टुकड़ा लगभग पूरा ही रक्त से लाल था। वे रोकर बोलीं, "हे माँ! तेरा तो ब्याह है, पारो!"
पार्वती ने स्थिर भाव से गगरी नीचे रख दी। माँ ने आकर रोते हुए पूछा, "यह सर्वनाश कैसे हुआ, पारो!"
पारो ने सहज भाव से कहा, "घाट पर पैर फिसल गया था। ईंट से सिर लग जाने से कट गया है।"
उसके बाद सब मिलकर घाव की देखभाल करने लगे। देवदास ने सच ही कहा था—चोट गहरी नहीं थी। चार-पाँच दिन में ही सूख गई। और आठ-दस दिन यूँ ही बीत गए। उसके बाद एक रात हाथीपोता गाँव के ज़मींदार श्रीयुत भुवनमोहन चौधरी दूल्हा बनकर विवाह करने आए। उत्सव में विशेष धूम-धड़ाका नहीं हुआ। भुवन बाबू निर्बुद्धि व्यक्ति नहीं थे—प्रौढ़ अवस्था में दुबारा विवाह करने आकर छोकरा बनना उन्होंने ठीक नहीं समझा।
वर की आयु चालीस से कम नहीं, कुछ ऊपर ही थी; गौरवर्ण, मोटे-ताज़े नंददुलाल जैसे शरीर! अधपकी मूँछें, माथे पर सामने की ओर थोड़ी-सी चाँद।
वर को देखकर कोई हँसा, कोई चुप रह गया। भुवन बाबू शांत-गंभीर मुख से कुछ-कुछ अपराधी की भाँति विवाह-मंडप में आकर खड़े हुए। कान उमेठने आदि के अत्याचार-उपद्रव नहीं हुए; क्योंकि इतने विज्ञ, गंभीर व्यक्ति के कानों तक किसी का हाथ नहीं पहुँचा। शुभ-दृष्टि के समय पार्वती ने कड़ी नज़रों से ताकती रही। होंठों के कोने पर हँसी की एक हल्की-सी रेखा थी,—भुवन बाबू ने किसी बच्चे की तरह दृष्टि नीची कर ली। मुहल्ले की स्त्रियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं। चक्रवर्ती महाशय दौड़-धूप करते रहे। अपने इस प्रौढ़ दामाद को लेकर वे कुछ व्यस्त हो उठे थे। ज़मींदार नारायण मुखुज्जे आज कन्या-कर्ता थे। पक्के आदमी थे—किसी भी पक्ष में, किसी भी ओर कोई त्रुटि नहीं हुई। शुभ कार्य सुचारु रूप से संपन्न हो गया।
दूसरे दिन प्रातःकाल चौधरी महाशय ने एक बक्सा गहने निकाल कर दिए। पार्वती का सर्वांग उन गहनों से झलमल कर उठा। जननी ने यह देखकर आँचल से आँखों के कोने पोंछे। पास ही ज़मींदार-गृहिणी खड़ी थीं—उन्होंने स्नेहपूर्वक झिड़ककर कहा, "आज आँसू बहाकर अमंगल मत कर, दीदी!"
संध्या से कुछ पूर्व मनोरमा पार्वती को एक निर्जन कमरे में खींच ले गई और आशीर्वाद दिया—"जो हुआ, अच्छा ही हुआ। अब देखना—कितने सुख से रहोगी।"
पार्वती थोड़ा हँसकर बोली, "हाँ, रहूँगी। यमराज से कल थोड़ा-सा परिचय जो हुआ है!"
"यह क्या कह रही है!"
"समय आने पर सब देख लोगी।"
मनोरमा ने तब दूसरी बात छेड़ी; कहा, "एक बार जी चाहता है कि देवदास को बुलाकर यह सोने की प्रतिमा दिखाऊँ!"
पार्वती जैसे चेतना में लौटी। "ला सकती हो दीदी? क्या एक बार उन्हें बुलाकर नहीं लाया जा सकता?"
कंठस्वर सुनकर मनोरमा सिहर उठी—"क्यों पारो!"
पार्वती हाथ का कंगन घुमाते-घुमाते अनमने भाव से बोली, "एक बार उनके चरणों की धूल माथे से लगा लूँगी—आज जाना जो है!"
मनोरमा ने पार्वती को अपनी छाती से लगाकर खींच लिया, और दोनों फूट-फूटकर रो पड़ीं। संध्या हो चुकी थी, कमरा अँधेरा था—पितामही ने दरवाज़ा ठेलकर बाहर से कहा, "ओ पारो, ओ मनो, तुम दोनों बाहर आओ दीदी!"
उसी रात पार्वती अपने पति के घर चली गई।
কমেন্ট (0)
লগ ইন করুন আলোচনায় যোগ দিতে।