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देवदास by Matribhasa Hindi

ग्यारहवाँ परिच्छेद

उसके बाद दो-तीन दिन देवदास यूँ ही पागलों की तरह सड़कों पर भटकता रहा। धर्मदास कुछ कहने गया तो देवदास ने आँखें तरेरकर उसे धमका दिया। यह रंग-ढंग देखकर चुनीलाल को भी कुछ कहने की हिम्मत न हुई। धर्मदास ने रोते हुए कहा, “चुनी बाबू, ऐसा क्यों हो गया?”

चुनीलाल ने कहा, “क्या हुआ है धर्मदास?”

एक अंधा दूसरे अंधे से राह पूछ रहा था। भीतर की बात दोनों में से कोई नहीं जानता था। आँसू पोंछते-पोंछते धर्मदास ने कहा, “चुनी बाबू, जैसे भी हो, देव बाबू को उनकी माँ के पास भेज दीजिए। और जब पढ़ाई-लिखाई करनी ही नहीं है, तो यहाँ रहने से क्या होगा?”

बात बिलकुल सच थी। चुनीलाल सोचने लगा। चार-पाँच दिन बाद, एक रोज़ ठीक वैसी ही शाम को चुनी बाबू बाहर निकल रहे थे कि देवदास ने कहीं से आकर उनका हाथ पकड़ लिया—“चुनी बाबू, वहीं जा रहे हो?”

चुनीलाल ने सकुचाकर कहना चाहा, “हाँ—नहीं, तुम कहो तो नहीं जाता।”

देवदास ने कहा, “नहीं, जाने से मना नहीं कर रहा; लेकिन एक बात बताओ, किस आस में तुम वहाँ जाते हो?”

“आस और क्या? यूँ ही वक़्त कट जाता है।”

“कट जाता है? कहाँ, मेरा तो वक़्त नहीं कटता। मैं वक़्त काटना चाहता हूँ।”

चुनीलाल कुछ देर उसके मुँह की ओर ताकता रहा, शायद उसके मन का भाव चेहरे पर पढ़ने की कोशिश कर रहा था। उसके बाद बोला, “देवदास, तुम्हें क्या हुआ है, खुलकर बता सकते हो?”

“कुछ भी तो नहीं हुआ।”

“नहीं बताओगे?”

“नहीं चुनी, बताने जैसा कुछ है ही नहीं।” चुनीलाल बहुत देर तक सिर झुकाए रहा, फिर बोला, “देवदास, एक बात मानोगे?”

“क्या?”

“तुम्हें एक बार और वहाँ चलना होगा। मैं ज़बान दे चुका हूँ।”

“जहाँ उस दिन गया था—वहीं तो?”

“हाँ—”

“छी!—मुझे अच्छा नहीं लगता।”

“जिससे अच्छा लगने लगे, मैं कर दूँगा।”

देवदास कुछ देर अनमने-से चुप रहकर बोला, “अच्छा, चलो चलते हैं।”

पतन की एक सीढ़ी और नीचे उतारकर चुनीलाल न जाने कहाँ खिसक गया था। अकेला देवदास चंद्रमुखी के कमरे में नीचे फर्श पर बैठकर शराब पी रहा है। कुछ दूर बैठी चंद्रमुखी विषाद-भरे मुख से उसे देखती हुई भयभीत-सी बोल उठी—“देवदास, और मत पियो।”

देवदास ने शराब का गिलास नीचे रखकर भौंहें सिकोड़ लीं, “क्यों?”

“अभी-अभी शराब पीनी शुरू की है, इतना सह नहीं पाओगे।”

“सहने के लिए शराब नहीं पीता। यहाँ रह सकूँ, बस इसीलिए पीता हूँ।”

यह बात चंद्रमुखी कई बार सुन चुकी थी। कभी-कभी उसके मन में आता कि दीवार से सिर पटककर लहूलुहान हो मरे। वह देवदास से प्रेम करने लगी थी। देवदास ने शराब का गिलास फेंक दिया। सोफ़े के पाये से लगकर वह चूर-चूर हो गया। तब वह तकिये का सहारा लेकर आड़ा लेट गया और लड़खड़ाती ज़बान में कहने लगा, “मुझमें उठकर जाने की ताक़त नहीं, इसलिए यहाँ बैठा रहता हूँ—होश नहीं रहता, इसलिए तुम्हारे मुँह की तरफ़ देखकर बातें करता हूँ—चं—द्र—फिर भी बेहोश नहीं होता—थोड़ा-सा होश फिर भी रह जाता है—तुम्हें छू नहीं पाता—मुझे बड़ी घृणा होती है।”

चंद्रमुखी ने आँखें पोंछकर धीरे-धीरे कहना शुरू किया, “देवदास, यहाँ कितने ही लोग आते हैं, वे कभी शराब को छूते तक नहीं।”

देवदास आँखें फाड़कर उठ बैठा। डगमगाते हुए इधर-उधर हाथ फेंककर बोला, “छूते नहीं? मेरे पास बंदूक होती तो उन्हें गोली मार देता। वे तो मुझसे भी बड़े पापी हैं!—चंद्रमुखी!”

कुछ देर रुककर वह कुछ सोचने लगा; फिर बोला, “अगर कभी शराब छोड़ी—हालाँकि छोडूँगा नहीं—तो फिर कभी यहाँ नहीं आऊँगा। मेरे पास तो उपाय है, पर उनका क्या होगा?”

थोड़ा रुककर वह कहने लगा, “बड़े दुख में शराब का सहारा लिया है—यह हमारी विपदा-दुख की संगिनी है! अब तुम्हें छोड़ नहीं सकता—”

देवदास तकिये पर मुँह रगड़ने लगा। चंद्रमुखी तेज़ी से पास आई और उसका मुँह ऊपर उठाया। देवदास ने त्योरियाँ चढ़ाईं—“छीः, छूना मत—अभी मुझे होश है। चंद्रमुखी, तुम तो जानती नहीं—बस मैं ही जानता हूँ कि मैं तुम लोगों से कितनी घृणा करता हूँ।”

“हमेशा घृणा करूँगा—फिर भी आऊँगा, फिर भी बैठूँगा, फिर भी बातें करूँगा—वरना कोई उपाय जो नहीं है। यह बात क्या तुममें से कोई समझेगा? हाः—हाः—लोग पाप का काम अँधेरे में करते हैं, और मैं यहाँ शराबी बनता हूँ—ऐसी उपयुक्त जगह दुनिया में और क्या होगी! और तुम लोग—”

देवदास ने दृष्टि संयत कर कुछ देर उसके उदास चेहरे की ओर देखा, फिर बोला, “आह! सहनशीलता की प्रतिमूर्ति! लांछना, भर्त्सना, अपमान, अत्याचार, उपद्रव—स्त्रियाँ कितना कुछ सह सकती हैं—तुम लोग उसका जीता-जागता उदाहरण हो!”

उसके बाद वह चित्त होकर लेट गया और धीरे-धीरे कहने लगा—“चंद्रमुखी कहती है, वह मुझसे प्रेम करती है—मैं वह नहीं चाहता—नहीं चाहता—नहीं चाहता—लोग थिएटर करते हैं, मुँह पर कालिख पोतते हैं—चोर बनते हैं—भिक्षा माँगते हैं—राजा बनते हैं—रानी बनते हैं—प्रेम करते हैं—प्रेम की कितनी बातें करते हैं—कितना रोते हैं—बिलकुल जैसे सब सच हो! चंद्रमुखी मेरे लिए अभिनय करती है, मैं देखता हूँ। लेकिन वह जो याद आती है—एक पल में जैसे सब कुछ हो गया। कहाँ वह चली गई—और किस राह पर मैं चला आया! अब तो एक जीवन-भर चलने वाला बड़ा नाटक शुरू हो गया है। एक पक्का शराबी—और यह एक—हो, तो यही सही—बुरा क्या है! कोई आशा नहीं, कोई भरोसा नहीं—न सुख, न कोई साध—वाह! बहुत अच्छा—”

उसके बाद देवदास ने करवट बदलकर बड़बड़ाकर कुछ कहा।

चंद्रमुखी वह समझ न सकी। थोड़ी ही देर में देवदास सो गया। तब चंद्रमुखी पास आकर बैठ गई। आँचल भिगोकर उसका मुँह पोंछ दिया, भीगा हुआ तकिया बदल दिया। एक पंखा लेकर कुछ देर हवा की, फिर देर तक सिर झुकाए बैठी रही। रात के कोई एक बज रहे थे। दीया बुझाकर, द्वार बंद कर, वह दूसरे कमरे में चली गई।

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