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देवदास লিখেছেন Matribhasa Hindi

चौदहवाँ परिच्छेद

लगभग दो वर्ष हुए, पार्वती महेंद्र का विवाह रचाकर काफ़ी निश्चिंत हो गई थी। जलदबाला बुद्धिमती और कार्य-कुशल थी। पार्वती के स्थान पर गृहस्थी के बहुत-से काम वही कर लिया करती। पार्वती का मन अब दूसरी ही ओर रम गया था। आज पाँच वर्ष बीत गए उसके विवाह को, किंतु कोई संतान न हुई। अपनी कोई संतान न होने के कारण दूसरों के बाल-बच्चों पर उसका बड़ा मोह था। ग़रीब-दुखियों की बात तो दूर रही, जो कुछ खाते-पीते लोग थे, उनके भी बेटे-बेटियों के ख़र्च का बड़ा हिस्सा वही उठाती। इसके सिवा ठाकुरबाड़ी के काम निपटाकर, साधु-संन्यासियों की सेवा करके और अंधों-अपाहिजों की देख-रेख में ही उसके दिन बीत रहे थे। पति को प्रेरित करके पार्वती ने एक और अतिथि-शाला बनवा दी थी। वहाँ बेसहारा, असहाय लोग जब तक चाहें ठहर सकते थे—ज़मींदार के घराने से ही उनके खाने-पहनने का प्रबंध हो जाता। एक और काम पार्वती बड़े गुप्त रूप से करती, यहाँ तक कि पति को भी उसकी भनक न लगने देती। निर्धन भद्र परिवारों की वह चुपके से आर्थिक सहायता किया करती। यह उसका अपना निजी ख़र्च था। पति से प्रति मास जो कुछ मिलता, सब इसी में व्यय हो जाता। परंतु चाहे जिस तरह भी ख़र्च क्यों न हो, सदर-कचहरी के नायब-गुमाश्तों की नज़र से कुछ छिपा न रहता। आपस में वे कानाफूसी करने लगे। दासी-बाँदियाँ चुपके से सुन आतीं कि घर का ख़र्च आजकल दुगुने से भी अधिक बढ़ गया है; ख़ज़ाना खाली पड़ा है—बचत के नाम पर कुछ जमा नहीं हो रहा। गृहस्थी में फ़िज़ूलख़र्ची बढ़े तो नौकर-चाकरों को भी जैसे मर्मान्तक पीड़ा होती है। उन्हीं के मुँह से जलद को ये सब बातें सुनने को मिलीं। एक रात उसने अपने पति से कहा, "क्या तुम इस घर के कोई नहीं हो?"

महेंद्र ने पूछा, "क्यों, ऐसा क्यों कहती हो?"

पत्नी बोली, "दास-दासियों को दिखाई देता है और तुम्हें नहीं दिखता? मालिक का मन तो नई बहू में अटका है, वे भला कुछ क्यों कहने लगे; पर तुम्हें तो बोलना चाहिए।"

महेंद्र बात समझ न सका, पर उत्सुक हो उठा; पूछा, "किस बात का ज़िक्र कर रही हो?"

जलदबाला गंभीर होकर पति को सिखलाने लगी, "नई माँ की अपनी तो कोई संतान है नहीं, उनका भला इस गृहस्थी में क्या मोह होगा? सब उड़ाए दे रही हैं, तुम्हें दिखाई भी नहीं देता?"

महेंद्र ने भौंहें सिकोड़कर कहा, "क्या करती हैं!"

जलद बोली, "तुम्हारी आँखें होतीं तो देखते। आजकल घर का दुगुना ख़र्च हो रहा है—सदाव्रत, दान-पुण्य, अतिथि-फ़कीर! ख़ैर, मान लिया कि वे अपने परलोक का साधन कर रही हैं; पर तुम्हारे भी तो बाल-बच्चे होंगे? तब वे क्या खाएँगे? अपनी सब चीज़ें बाँट-बूटकर क्या अंत में भीख माँगोगे?"

महेंद्र बिस्तर पर उठ बैठा और बोला, "तुम किसकी बात कर रही हो, माँ की?"

जलद बोली, "मेरी तो फूटी किस्मत है कि ये बातें भी मुँह खोलकर कहनी पड़ रही हैं।"

महेंद्र ने कहा, "तो तुम माँ के नाम की नालिश करने आई हो?"

जलद ने तिनककर कहा, "मुझे कोई नालिश-मुक़दमा नहीं करना। बस भीतर का हाल बता दिया, नहीं तो आगे चलकर मुझे ही दोष देते।"

महेंद्र बहुत देर तक चुपचाप बैठा रहा, फिर बोला, "तुम्हारे मायके में तो रोज़ हंडिया भी नहीं चढ़ती, तुम ज़मींदार के घर के ख़र्च-बर्च का हिसाब क्या समझोगी?"

अब जलद भी जल-भुन उठी; बोली, "ज़रा सुनूँ तो, तुम्हारी माँ के मायके में ही कौन-सी दर्जनों अतिथि-शालाएँ खुली थीं?"

महेंद्र आगे बहस न करके चुपचाप पड़ा रहा। सबेरे उठकर वह पार्वती के पास आया और बोला, "माँ, यह कैसी लड़की से मेरी शादी करा दी! इसके साथ तो गृहस्थी चलाना ही कठिन है। मैं कलकत्ता जा रहा हूँ।"

पार्वती ने चकित होकर कहा, "क्यों बेटा?"

"आपके नाम पर कटु वचन बोलती है—मैंने तो इसे त्याग दिया।"

पार्वती कुछ दिनों से बड़ी बहू के ढंग देख रही थी; पर उसने मन का भाव छिपाकर मुस्कुराते हुए कहा, "छी बेटा! वह तो मेरी बहुत ही अच्छी बच्ची है!" इसके बाद उसने जलद को एकांत में बुलाकर कहा, "बहू, क्या झगड़ा हो गया है?"

सवेरे से ही पति की कलकत्ता-यात्रा की तैयारी देखकर जलद मन ही मन डर गई थी; सास की बात सुनकर रो पड़ी और बोली, "मेरी ही भूल थी माँ! पर वे नौकर-चाकर ही तो ख़र्च-पानी की बातें कर रहे थे।"

पार्वती ने तब पूरी बात सुनी। वह स्वयं लज्जित हुई और बहू के आँसू पोंछकर बोली, "बहू, तुम ठीक कहती हो। पर मैं तो ठहरी गृहस्थी के झंझटों से बेख़बर, इसलिए ख़र्च की ओर मेरा ध्यान ही न गया।"

इसके बाद उसने महेंद्र को बुलाकर समझाया, "बेटा, बिना दोष के रुष्ट न होओ—तुम उसके पति हो, तुम्हारे मंगल-चिंतन के आगे स्त्री के लिए अन्य सब बातें तुच्छ होनी चाहिए। बहू तो तुम्हारी साक्षात लक्ष्मी है।"

किंतु उसी दिन से पार्वती ने हाथ समेट लिया। अतिथि-शाला और ठाकुरबाड़ी की सेवा में अब पहले जैसी रौनक़ न रही; कितने ही अनाथ, अंधे और फ़कीर निराश लौटने लगे। यह सुनकर चौधरी महाशय ने पार्वती को बुलाकर पूछा, "कनया-बहू, क्या लक्ष्मी का भंडार रीता हो गया?"

पार्वती ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया, "केवल लुटाते रहने से कैसे चलेगा? कुछ दिन संचित भी तो करना चाहिए—देखते नहीं, ख़र्च कितना बढ़ गया है!"

"अरे जाने भी दो! मेरे अब दिन ही कितने बचे हैं? कुछ दिन सत्कर्म करके परलोक का ध्यान रखना चाहिए।"

पार्वती हँसकर बोली, "यह तो बड़े स्वार्थ की बात हुई जी! केवल अपना ही देखोगे, और क्या बाल-बच्चे मँझधार में बह जाएँगे? कुछ दिन चुपचाप शांत रहिए, फिर सब वैसा ही हो जाएगा। आदमी के काम कभी ख़त्म थोड़े ही होते हैं!"

लाचार होकर चौधरी महाशय चुप हो रहे।

पार्वती के पास अब काम कम था, इसलिए सोच-विचार कुछ बढ़ गया था। किंतु हर चिंता का अपना एक ढंग होता है। जिसे आशा होती है, वह एक तरह से सोचता है; और जिसे आशा नहीं होती, वह दूसरी तरह से सोचता है। पहली तरह की चिंता में सजीवता होती है, सुख होता है, तृप्ति होती है, दुख और उत्कंठा होती है; इसीलिए वह मनुष्य को थका देती है—कोई बहुत देर तक सोच नहीं पाता। परंतु आशाहीन के जीवन में न सुख है, न दुख, न उत्कंठा; फिर भी एक प्रकार की शांति-तृप्ति होती है। आँखों से आँसू भी गिरते हैं, उसमें गहराई भी होती है—किंतु वह नित्य नया होकर मर्म को नहीं बेधता। हलके बादलों की भाँति जहाँ-तहाँ तैरता फिरता है। जहाँ हवा का झोंका नहीं लगता, वहाँ ठहर जाता है; और जहाँ लगता है, वहाँ से हट जाता है; तन्मय मन किसी उद्वेगहीन चिंतन में ही अपनी सार्थकता पा लेता है। पार्वती की दशा आजकल ठीक ऐसी ही हो गई थी। पूजा-आह्निक करने बैठती तो उसका अधीर, निरुद्देश्य और हताश मन पलक झपकते ही तालसोनापुर के बाँस के झुरमुटों, आम के बग़ीचों, पाठशाला के कमरे और बाँध के भीटे की ओर चक्कर लगा आता। फिर न जाने किस अज्ञात कोने में छिप बैठता कि पार्वती स्वयं अपने-आप को ढूँढ न पाती। कभी पहले होठों के छोर पर मुस्कान उभरी होती, तो अब आँख का एक आँसू टपककर आचमनी के जल में जा मिलता। फिर भी दिन बीत ही जाते। काम-काज करते हुए, मीठी बातें बोलते हुए, परोपकार और सेवा-शुश्रूषा में भी कट जाते, और कभी सब कुछ भूलकर ध्यानमग्न योगिनी की भाँति भी कट जाते। कोई कहता—साक्षात अन्नपूर्णा है! कोई कहता—अन्यामनस्क उदासिनी है! परंतु कल प्रातःकाल से उसमें एक दूसरे ही प्रकार का परिवर्तन दिखाई दे रहा है। जैसे कुछ तीखा, कुछ कठोर। उस लबालब भरी, शांत-गंभीर ज्वार-गंगा में जैसे सहसा न जाने कहाँ से भाटे का खिंचाव आ लगा हो। घर में कोई इसका कारण नहीं जानता, केवल हम जानते हैं। मनोरमा ने कल गाँव से एक पत्र लिखा है। उसने जो लिखा है, वह इस प्रकार है—

पार्वती, बहुत दिनों से हम दोनों में से किसी ने एक-दूसरे को पत्र नहीं लिखा, इसलिए दोष दोनों ही तरफ़ रहा है। मेरी इच्छा है कि अब मेल-मिलाप हो जाए। दोनों ही अपनी भूल स्वीकार करके इस अभिमान को कम करें। पर चूँकि मैं बड़ी हूँ, इसलिए मैंने ही मान की भीख माँग ली। आशा है शीघ्र उत्तर दोगी। यहाँ आए मुझे लगभग एक महीना हो गया है। हम गृहस्थ घर की स्त्रियाँ शरीर के भले-चंगे होने का मर्म वैसा नहीं समझतीं।

मर जाएँ तो कहते हैं गंगा-लाभ हो गया; और जीती रहें तो कहते हैं, अच्छी हैं। सो मैं भी अच्छी ही हूँ। पर यह तो हुई अपनी बात, फ़ालतू बात। काम की बात भी ऐसी कोई विशेष हो, सो बात नहीं। फिर भी एक समाचार देने की बड़ी प्रबल इच्छा हुई है। कल से सोच रही हूँ कि दूँ या न दूँ। दूँगी तो तुम्हें कष्ट होगा, न दूँ तो मुझसे रहा नहीं जाता—मेरी तो मारीच जैसी दशा हो गई है। देवदास की बात सुनकर तुम्हें दुख तो होगा ही, पर मैं भी तुम्हारी बात सोचकर रोए बिना नहीं रह सकती। भगवान ने रक्षा की, नहीं तो तुम जैसी मानिनी उसके हत्थे चढ़तीं तो इतने दिनों में या तो जल में डूब मरतीं या विष खा लेतीं। और उसकी बात आज नहीं तो दो दिन बाद सुनोगी ही, क्योंकि जो बात पूरे संसार को मालूम है, उसे भला कब तक छिपाया जा सकता है?

आज लगभग छह-सात दिन हुए, वह यहाँ आया है। तुम तो जानती ही हो, ज़मींदारिन माँ काशीवासी हो गई हैं और देवदास कलकत्तावासी हो गया है। गाँव तो वह केवल बड़े भाई से झगड़ा करने और रुपये ऐंठने आता है। सुना है, अब वह बीच-बीच में आता है; जब तक रुपयों का जुगाड़ नहीं हो जाता, ठहरा रहता है—रुपये मिलते ही चंपत हो जाता है।

उसके पिता को मरे आज ढाई साल हो गए। सुनकर आश्चर्य करोगी, इतने से समय में उसने अपनी आधी जायदाद उड़ा दी है। द्विजदास तो कहो बड़ा हिसाब-किताब रखने वाला आदमी है, सो किसी तरह पैतृक संपत्ति बचाए हुए है, वरना अब तक तो पाँचों उँगलियाँ इसमें लगी होतीं और लोग इसे लूट चुके होते। शराब और वेश्याओं में सर्वस्व लुट रहा है, उसे कौन बचाएगा? एक तरफ़ यमराज खड़े हैं! और उनके आने में भी शायद अब अधिक देर नहीं है। बस यही एक बचाव रहा कि उसने विवाह नहीं किया।

आह, दुख भी होता है। न वह कंचन-सा वर्ण रहा, न वह रूप, न वह कांति—लगता है जैसे कोई और ही प्राणी हो! रूखे-सूखे बाल हवा में उड़ रहे हैं, आँखें कोटरों में धँस गई हैं, नाक जैसे खांडे की तरह तनी हुई उठ आई है। ऐसा बीभत्स हो गया है कि तुमसे क्या कहूँ! देखकर घिन आती है, डर लगता है। दिन-भर नदी के किनारे, बाँध के भीटे पर बंदूक हाथ में लिए चिड़ियाँ मारता फिरता है। और धूप में जब सिर घूमने लगता है, तो बाँध के किनारे उसी बेर के पेड़ के नीचे सिर झुकाए बैठा रहता है। शाम के बाद घर जाकर शराब पीता है—रात में सोता है या भटकता फिरता है, भगवान ही जाने!

उस दिन संध्या के समय नदी से पानी लेने गई थी; देखा, देवदास हाथ में बंदूक लिए धीरे-धीरे सूखे चेहरे से चला जा रहा है। मुझे पहचानकर पास आकर खड़ा हो गया—मैं तो मारे डर के सूख गई! घाट पर कोई आदमजात न था—उस दिन मेरी तो जान ही हलक में अटक गई थी। ठाकुर जी ने रक्षा की कि उसने कोई अनर्गल मातमी या बदमाशी नहीं की। भलेमानसों की तरह शांत भाव से बोला, 'मनो, अच्छी तो हो दीदी?'

मैं और क्या करती, डरते-डरते सिर हिलाकर बोली, 'हाँ'।

तब उसने एक ठंडी साँस खींचकर कहा, 'सुखी रहो बहन, तुम लोगों को देखकर बड़ा आनंद होता है।' इसके बाद धीरे-धीरे चला गया। मैं तो गिरती-पड़ती प्राण हथेली पर लेकर भागी। अरे बाप रे! भाग्य कि उसने हाथ-वाथ कुछ नहीं पकड़ा! ख़ैर, उसकी बात छोड़ो—ऐसे दुराचारियों की बातें लिखने बैठूँ तो चिट्ठी छोटी पड़ जाएगी।

बड़ा कष्ट दिया न बहन? आज भी यदि उसे नहीं भूली होगी तो कष्ट होगा ही। पर उपाय भी क्या है? और इसके लिए यदि तुम्हारे अरुणिमा से रंगे चरणों में अपराध हुआ हो, तो अपनी सहज कृपा से अपनी स्नेहाकांक्षिणी मनोदीदी को क्षमा कर देना।

कल पत्र आया था। आज उसने महेंद्र को बुलाकर कहा, "दो पालकियाँ और बत्तीस कहार चाहिए, मैं अभी तालसोनापुर जाऊँगी।"

महेंद्र ने विस्मित होकर पूछा, "पालकी और बेहरे मँगवाए देता हूँ, पर दो क्यों माँ?"

पार्वती ने कहा, "तुम साथ चलोगे बेटा! राह में यदि मर जाऊँ, तो मुँह में आग देने के लिए बड़े बेटे की आवश्यकता होगी।"

महेंद्र आगे कुछ न बोला। पालकी आने पर दोनों ने प्रस्थान किया।

चौधरी महाशय को पता चला तो वे व्याकुल होकर नौकर-चाकरों से पूछने लगे, पर कोई भी कारण न बता सका। तब उन्होंने अपनी बुद्धि से काम लेकर पाँच-छह दरबान और दास-दासियाँ और साथ भेज दिए।

एक सिपाही ने पूछा, "रास्ते में भेंट हो तो क्या पालकी लौटा लाएँ?"

उन्होंने सोच-समझकर कहा, "नहीं, उसकी ज़रूरत नहीं। तुम लोग साथ जाओ—ताकि कोई विपत्ति-आपत्ति न आने पाए।"

उसी दिन संध्या के बाद दोनों पालकियाँ तालसोनापुर पहुँचीं, किंतु देवदास गाँव में न था। वह उसी दिन दोपहर को कलकत्ते चला गया था।

पार्वती ने माथा ठोककर कहा, "भाग्य!" फिर वह मनोरमा से मिली।

मनो ने पूछा, "पारू, क्या देवदास को देखने आई थी?"

पार्वती बोली, "नहीं, साथ ले जाने के लिए आई थी। यहाँ उसका अपना तो कोई है नहीं।"

मनोरमा अवाक रह गई। बोली, "क्या कहती है! तुझे लज्जा न आई?"

"लज्जा फिर किससे? अपनी चीज़ खुद ले जाऊँगी—इसमें लज्जा कैसी?"

"छी-छी! यह कैसी बात! कोई नाता-रिश्ता तक तो नहीं है—ऐसी बात मुँह पर मत ला।"

पार्वती म्लान मुस्कान हँसकर बोली, "मनोदीदी, होश सँभालने से लेकर जो बात छाती के भीतर घर बनाए बैठी है, कभी-कभार वह मुँह से निकल ही पड़ती है। तुम बहन हो, इसीलिए तुमने यह बात सुन ली।"

अगले दिन प्रातःकाल पार्वती माता-पिता के चरणों में प्रणाम करके पुनः पालकी पर सवार हो गई।

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