देवदास লিখেছেন Matribhasa Hindi
पंद्रहवाँ परिच्छेद
आज दो वर्ष से अश्वत्थझुरी गाँव में चंद्रमुखी ने अपना घर बसा लिया है। छोटी नदी के किनारे एक ऊँची जगह पर उसके मिट्टी के दो साफ़-सुथरे घर हैं; बगल में एक छप्पर, जिसमें काले रंग की एक हृष्ट-पुष्ट गाय बँधी रहती है। दो घरों में से एक में रसोई और भंडार है; दूसरे में वह सोती है। आँगन साफ़-सुथरा है, रमा बागदी की बेटी रोज़ लीप-पोत जाती है। चारों ओर अरंडी की बाड़ है, बीच में एक बेर का पेड़ और एक किनारे तुलसी का झुरमुट। सामने नदी का घाट है—मज़दूर लगाकर, खजूर के पेड़ कटवाकर उसने सीढ़ियाँ बनवा ली हैं। उसके सिवा इस घाट का कोई और उपयोग नहीं करता। वर्षा के समय दोनों किनारे भरकर चंद्रमुखी के घर के नीचे तक पानी आ जाता है। गाँव के लोग व्यग्र होकर कुदाल लेकर दौड़ पड़ते हैं। नीचे मिट्टी डालकर जगह ऊँची कर जाते हैं। इस गाँव में भद्रजनों की बस्ती नहीं है। किसान, ग्वाले, बागदी, दो घर तेली और गाँव के छोर पर दो-एक घर मोची बसते हैं। चंद्रमुखी ने इस गाँव में आकर देवदास को समाचार दिया; उत्तर में उसने कुछ और रुपये भेज दिए। यही रुपये चंद्रमुखी गाँव के लोगों को उधार देती है। विपत्ति-आपत्ति में सब उसके पास दौड़े आते हैं—रुपये लेकर घर जाते हैं। चंद्रमुखी सूद नहीं लेती—उसके बदले वे अपनी इच्छा से कभी केला, कभी मूली, या खेत की साग-सब्ज़ी दे जाते हैं; मूलधन के लिए भी वह कभी ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं करती। जो नहीं दे पाता, वह नहीं देता।
चंद्रमुखी हँसकर कहती, अब तुझे कभी नहीं दूँगी।
वह नम्रता से कहता, माँ ठकुराइन, आशीर्वाद दो, इस बार फ़सल अच्छी हो।
चंद्रमुखी आशीर्वाद देती है। फिर शायद अच्छी फ़सल नहीं होती, लगान का तगादा होता है—
वह फिर आकर हाथ पसारकर खड़ा हो जाता है—चंद्रमुखी फिर दे देती है। मन-ही-मन हँसकर कहती, वे जीते रहें, मुझे रुपयों की क्या चिंता!
किंतु वे हैं कहाँ? लगभग छह महीने हो गए, उसे कोई समाचार नहीं मिला। पत्र लिखने पर जवाब नहीं आता, रजिस्ट्री कराकर भेजने पर लौट आती है। एक ग्वाले के परिवार को चंद्रमुखी ने अपने घर के पास बसाया है, उसके बेटे के विवाह में साढ़े दस गंडा रुपये दहेज में दिए हैं, एक जोड़ी हल-बैल ख़रीद दिए हैं। वे सपरिवार चंद्रमुखी के आश्रित और नितांत अनुगत हैं। एक दिन सवेरे चंद्रमुखी ने भैरव ग्वाले को बुलाकर कहा, भैरव, तालसोनापुर यहाँ से कितनी दूर है, जानते हो?
भैरव ने सोचकर कहा, दो खेत पार करते ही कचहरी है।
चंद्रमुखी ने प्रश्न किया, वहाँ ज़मींदार रहते हैं क्या?
भैरव ने कहा, हाँ, वे इस मुल्क के ज़मींदार हैं। यह गाँव उन्हीं का है। आज तीन बरस हुए वे स्वर्ग सिधार गए; सारी प्रजा ने एक महीने तक वहाँ पूरी-मिठाई खाई थी। अब उनके दो बेटे हैं, बहुत बड़े आदमी—राजा हैं।
चंद्रमुखी ने कहा, भैरव, मुझे वहाँ ले चल सकते हो?
भैरव बोला, क्यों नहीं ले चलूँगा माँ, जिस दिन इच्छा हो, चलो।
चंद्रमुखी उत्सुक होकर बोली, तो चलो न भैरव, हम आज ही चलते हैं।
भैरव चकित होकर बोला, आज ही? फिर चंद्रमुखी के मुख की ओर देखकर बोला, तो माँ, तुम जल्दी से रसोई बना लो, मैं भी थोड़े मुरमुरे बाँध लेता हूँ।
चंद्रमुखी बोली, मैं अब रसोई नहीं करूँगी भैरव, तुम मुरमुरे बाँध लो।
भैरव घर जाकर कुछ मुरमुरे और गुड़ अँगोछे में बाँधकर कंधे पर डाल लाया। हाथ में एक लाठी लेकर थोड़ी देर बाद लौटकर बोला, तो चलो; लेकिन तुम कुछ खाओगी नहीं माँ?
चंद्रमुखी बोली, नहीं भैरव, अभी मेरा पूजा-पाठ नहीं हुआ है; यदि समय मिला तो वहीं जाकर यह सब करूँगी।
भैरव आगे-आगे राह दिखाता चला। पीछे-पीछे चंद्रमुखी बड़ी कठिनाई से मेड़ों पर चलती रही। अनभ्यस्त कोमल पाँव क्षत-विक्षत होकर लहूलुहान हो गए, धूप में सारा मुखड़ा लाल हो उठा। स्नान-भोजन कुछ भी नहीं हुआ था; फिर भी चंद्रमुखी एक के बाद एक खेत पार करती चली गई। खेतों के किसान अचरज से उसका मुँह ताकते रह गए।
चंद्रमुखी लाल किनारी की एक साड़ी पहने थी, हाथों में दो-दो कंगन, सिर पर माथे तक आधा घूँघट; सारा शरीर एक मोटी चादर में लिपटा हुआ था। जब सूर्यदेव के अस्त होने में अधिक विलंब न था, उस समय दोनों गाँव में आ पहुँचे। चंद्रमुखी ने मंद-मंद हँसकर कहा, भैरव, तुम्हारे दो खेत क्या अब जाकर पूरे हुए?
भैरव परिहास न समझकर सरलता से बोला, माँ ठकुराइन, अब आ गए हैं; लेकिन तुम्हारे इस सुकुमार शरीर से क्या आज लौट पाना संभव होगा?
चंद्रमुखी ने मन-ही-मन कहा, आज क्या, कल भी शायद यह राह न चल पाऊँगी।
प्रकट रूप में बोली, भैरव, गाड़ी नहीं मिलती?
भैरव बोला, मिलती क्यों नहीं माँ, बैलगाड़ी ठीक करूँ?
गाड़ी ठीक करने का आदेश देकर चंद्रमुखी ज़मींदार-भवन में प्रविष्ट हुई।
भैरव गाड़ी का प्रबंध करने दूसरी ओर चला गया। अंदर ऊपर के बरामदे में बड़ी बहू (आजकल की ज़मींदारिन) बैठी थीं। एक दासी वहीं चंद्रमुखी को ले आई। दोनों ने एक-दूसरे को परखा।
चंद्रमुखी ने नमस्कार किया। बड़ी बहू के तन पर गहने अँटते न थे, आँखों के कोरों से अहंकार फूटा पड़ता था। पान और मिस्सी से होंठ और दाँत लगभग काले पड़ गए थे। एक गाल फूला हुआ था, शायद दोक्ता और पान से भरा था। बाल ऐसे कसकर बाँधे गए थे कि जूड़ा सिर की चोटी पर जा चढ़ा था। दोनों कानों में छोटे-बड़े बीस-तीस झुमके थे। नाक के एक तरफ़ नक़चबी थी, दूसरी तरफ़ एक बड़ा-सा छेद—शायद सास के ज़माने में उसमें नथ पहनी जाती होगी।
चंद्रमुखी ने देखा, बड़ी बहू का शरीर काफ़ी मोटा-ताज़ा, माँजा-घिसा है, रंग साँवला, आँखें बड़ी-बड़ी, मुख गोल-सा—तन पर काले किनारी की साड़ी, बदन पर एक कीमती कुरता—उसी को देखकर चंद्रमुखी को घृणा-सी हुई। और बड़ी बहू ने देखा कि चंद्रमुखी की उम्र होने पर भी शरीर में रूप अँटता नहीं। दोनों शायद हमउम्र थीं, किंतु बड़ी बहू ने मन-ही-मन यह स्वीकार नहीं किया। इस गाँव में पार्वती के सिवा इतना रूप उन्होंने और किसी का नहीं देखा था। आश्चर्यचकित होकर पूछा, तुम कौन हो जी?
चंद्रमुखी ने कहा, मैं आपकी ही एक प्रजा हूँ; कुछ लगान बाक़ी पड़ गया था, वही देने आई हूँ।
बड़ी बहू मन-ही-मन प्रसन्न होकर बोलीं, तो यहाँ क्यों? कचहरी-घर जाओ न।
चंद्रमुखी मंद-मंद हँसकर बोली, माँ, हम दुःखी लोग हैं, सारा लगान तो दे नहीं पाते। सुना है, आपकी बड़ी दया है; इसीलिए आपके पास ही आई हूँ, दया करके कुछ माफ़ कर दीजिए।
ऐसी बात बड़ी बहू ने जीवन में पहली बार सुनी। उनमें दया है, वे लगान माफ़ कर सकती हैं—इसलिए चंद्रमुखी तुरंत उनकी प्रियपात्री बन गई। बड़ी बहू ने कहा, सो तो है बेटी, दिन में न जाने कितने रुपये मुझे छोड़ देने पड़ते हैं, कितने लोग मुझे पकड़ते हैं; मैं न नहीं कह पाती, इसीलिए मालिक मुझ पर कितना गुस्सा करते हैं।—तो तुम्हारा कितना रुपया बाक़ी है?
ज़्यादा नहीं माँ, केवल दो रुपये; लेकिन हमारे लिए वही पहाड़ जैसा है; आज दिन-भर का रास्ता चलकर आई हूँ।
बड़ी बहू ने कहा, अहा, तुम लोग दुःखी हो, हमें दया करनी ही चाहिए। ओ बिंदू, इसे बाहर ले जा, दीवानजी से मेरा नाम लेकर कह दे कि दो रुपये माफ़ कर दिए जाएँ। अच्छा बेटी, तुम्हारा घर कहाँ है?
चंद्रमुखी बोली, आपके ही राज में—उसी अश्वत्थझुरी गाँव में। अच्छा माँ, मालिक लोग अब दो हिस्सेदार हैं, है न?
बड़ी बहू बोलीं, फूटा करम! छोटा हिस्सेदार अब रहा ही कहाँ है? दो दिन बाद सब मेरा ही हो जाएगा।
चंद्रमुखी चिंतित होकर पूछ बैठी, क्यों माँ? छोटे बाबू का कुछ क़र्ज़-वर्ज़ है क्या?
बड़ी बहू ने थोड़ा हँसकर कहा, सब कुछ मेरे पास ही गिरवी है। देवर तो एकदम हाथ से निकल गया है! कलकत्ते में शराब-रंडीबाज़ी में ही डूबा रहता है। कितने रुपये उड़ा दिए, उसका कोई ओर-छोर है!
चंद्रमुखी का मुँह सूख गया, ज़रा रुककर पूछा, हाँ माँ, तो क्या छोटे बाबू घर भी नहीं आते?
बड़ी बहू बोलीं, आएँगे क्यों नहीं! जब रुपयों की ज़रूरत होती है, आते हैं। क़र्ज़ करते हैं, जायदाद देते हैं—चले जाते हैं। अभी दो महीने पहले ही आकर बारह हज़ार रुपये ले गए हैं। जीने के लक्षण भी नहीं हैं, सारे बदन में घिनौनी बीमारी हो गई है—छिः-छिः—
चंद्रमुखी सिहर उठी—म्लान मुख से पूछा, वे कलकत्ते में कहाँ रहते हैं?
बड़ी बहू ने कपाल पर एक हाथ पटककर हँसते हुए कहा, अभागिन दशा! वह कोई जानता है भला? कहाँ किस होटल में खाता है—जिस-तिस के घर पड़ा रहता है—यह वही जाने, या यमराज जाने।
चंद्रमुखी सहसा उठ खड़ी हुई, बोली, मैं—चलती हूँ—
बड़ी बहू ज़रा चकित होकर बोलीं, जाओगी? अरे ओ बिंदू—
चंद्रमुखी ने रोककर कहा, रहने दीजिए माँ, मैं अपने-आप कचहरी चली जाऊँगी, कहकर धीरे-धीरे चली गई। घर से बाहर निकलकर देखा, भैरव प्रतीक्षा कर रहा है—बैलगाड़ी तैयार है। उसी रात चंद्रमुखी घर लौट आई। सवेरे भैरव को फिर बुलाकर कहा, भैरव, मैं आज कलकत्ता जाऊँगी; तुम तो जा नहीं सकोगे, इसलिए तुम्हारे बेटे को साथ ले लूँगी, क्या कहते हो?
तुम्हारी इच्छा। लेकिन कलकत्ते क्यों माँ, कोई ख़ास काम है क्या?
हाँ भैरव, ख़ास काम है।
फिर कब आओगी माँ?
यह नहीं कह सकती भैरव। शायद जल्दी लौट आऊँ, शायद देर हो जाए। और अगर न आऊँ, तो यह सब घर-द्वार तुम्हारा रहा।
पहले तो भैरव अवाक् रह गया। फिर उसकी दोनों आँखें आँसुओं से भर गईं। बोला, यह क्या कह रही हो माँ! तुम नहीं आओगी तो इस गाँव का कोई भी आदमी नहीं बचेगा।
चंद्रमुखी ने सजल नेत्रों से मंद-मंद हँसकर कहा, यह क्या भैरव, मैं तो दो बरस पहले ही यहाँ आई हूँ। उससे पहले क्या तुम लोग जीते नहीं थे?
इसका उत्तर मूर्ख भैरव न दे सका, किंतु चंद्रमुखी ने अपने अंतर में सब समझ लिया। भैरव का बेटा केबला ही साथ जाएगा। गाड़ी में आवश्यक सामान लदवाकर चढ़ते समय मोहल्ले के स्त्री-पुरुष सब देखने आए, देखकर रोने लगे। चंद्रमुखी की अपनी आँखों में भी आँसू नहीं थम रहे थे। धूल पड़े ऐसे कलकत्ते पर! देवदास के लिए न होता तो कलकत्ते की रानी का पद पाने के लिए भी चंद्रमुखी इतने प्यार को ठुकराकर नहीं जा सकती थी।
दूसरे दिन वह क्षेत्रमणि के घर आ पहुँची। उसके पुराने मकान में अब दूसरे लोग आ गए थे। क्षेत्रमणि अवाक् रह गई—दीदी जो! कहाँ थीं इतने दिन?
चंद्रमुखी ने सच छिपाकर कहा, इलाहाबाद में थी।
क्षेत्रमणि ने अच्छी तरह नज़र डालकर उसके सर्वांग का निरीक्षण करके कहा, तुम्हारे गहने-गाँठे क्या हुए दीदी?
चंद्रमुखी ने हँसकर संक्षेप में कहा, सब हैं।
उसी दिन पंसारी से मिलकर कहा, दयाल, मुझे तुमसे कितने रुपये लेने हैं?
दयाल संकट में पड़ गया—बेटी, लगभग साठ-सत्तर रुपये। आज नहीं तो दो दिन बाद दे दूँगा।
तुम्हें कुछ नहीं देना होगा। अगर मेरा एक काम कर दो।
क्या काम?
दो दिन खटना होगा, बस। हमारे मोहल्ले में एक घर किराए पर लोगे—समझे?
दयाल ने हँसकर कहा, समझ गया बेटी।
अच्छा घर। बढ़िया बिस्तर, तकिये, चादरें, बत्तियाँ, तस्वीरें, दो कुर्सियाँ, एक मेज़—समझे?
दयाल ने सिर हिलाया।
आईना, कंघी, रंगे हुए दो जोड़े कपड़े, बदन का कुरता, और—अच्छे गिल्टी के गहने कहाँ मिलते हैं, जानते हो?
दयाल पंसारी ने पता बता दिया।
चंद्रमुखी ने कहा, तो वह भी एक सेट अच्छा-सा ख़रीदना होगा—मैं साथ जाकर पसंद कर लूँगी। फिर हँसकर कहा, हमें जो कुछ चाहिए, जानते तो हो सब,—एक नौकरानी भी ठीक करनी होगी।
दयाल ने कहा, कब चाहिए बेटी?
जितनी जल्दी हो। दो-तीन दिन में हो जाए तो अच्छा है। कहकर चंद्रमुखी ने उसके हाथ में सौ रुपये का एक नोट थमा दिया,—अच्छी चीज़ें लेना, सस्ती मत लेना।
तीसरे दिन वह नए घर में चली गई। दिन-भर केवलराम को लेकर मन-माफ़िक़ घर सजाया और संध्या से पूर्व स्वयं सजने बैठी। साबुन से मुँह धोकर उस पर पाउडर लगाया, आलता घोलकर पैरों में रचा, पान खाकर होंठ रँगे। उसके बाद सर्वांग में गहने पहन, कुरता कसकर रंगे हुए वस्त्र धारण किए; बहुत दिनों बाद बाल सँवारे और फिर से टीप लगाई। आईने में मुँह देखकर मन-ही-मन हँसकर बोली, इस जले भाग्य में और क्या-क्या बदा है!
गाँव का लड़का केवलराम सहसा यह अभिनव साज-सज्जा, वेश-भूषा देखकर भयभीत होकर बोला, दीदी, यह क्या!
चंद्रमुखी ने हँसकर कहा, केवल, आज मेरा दूल्हा आएगा।
केवलराम विस्मय से ताकता रहा।
संध्या के बाद क्षेत्रमणि घूमने आई,—दीदी, यह फिर क्या?
चंद्रमुखी ने होंठ भींचकर हँसते हुए कहा, इन सब की फिर से ज़रूरत है न।
क्षेत्रमणि कुछ देर देखती रहकर बोली, दीदी की जितनी उम्र बढ़ रही है, रूप भी उतना ही बढ़ रहा है।
उसके चले जाने पर चंद्रमुखी बहुत दिन पहले की तरह फिर खिड़की के पास जा बैठी।
अपलक नेत्रों से सड़क की ओर ताकती रही। यही उसका काम था; यही करने वह आई थी—जब तक यहाँ रहेगी, तब तक यही करेगी। कोई नया आदमी शायद आना चाहता है, दरवाज़ा खटखटाता है; केवलराम रटे-रटाए अंदाज़ में भीतर से कह देता—यहाँ नहीं।
कोई पुराना परिचित आ पहुँचता। चंद्रमुखी उसे बिठाकर हँसकर बात करती; बातों-बातों में देवदास की बात पूछती; वे बता नहीं पाते—तुरंत विदा कर देती। रात गहराने पर स्वयं बाहर निकल पड़ती। मोहल्ले-मोहल्ले, दरवाज़े-दरवाज़े घूमती-फिरती। अदृश्य रहकर द्वारों पर कान लगाकर बातें सुनना चाहती—तरह-तरह के लोग तरह-तरह की बातें करते, जो सुनना चाहती, वह किंतु सुनने को नहीं मिलता—कोई मुँह ढँके अचानक सामने आ खड़ा होता—स्पर्श करने के लिए हाथ बढ़ाता—चंद्रमुखी हड़बड़ाकर हट जाती। दोपहर में पुरानी परिचित संगिनियों के घर घूमने जाती। बातों-बातों में प्रश्न करती,—कोई देवदास को जानती हो?
वे पूछतीं, कौन देवदास?
चंद्रमुखी उत्सुक होकर परिचय देने लगती—गोरा रंग, सिर पर घुँघराले बाल, माथे पर बाईं ओर एक कटने का निशान, बड़ा आदमी—बेहिसाब रुपये ख़र्च करता है, कोई पहचानती हो क्या?
कोई पता नहीं दे पाता। निराश, विषादपूर्ण मुख लिए चंद्रमुखी घर लौट जाती। गहरी रात तक जागकर सड़क की ओर ताकती रहती। नींद आने पर खीझ उठती; मन-ही-मन कहती, यह क्या तेरे सोने का समय है?
धीरे-धीरे एक महीना बीत गया, केवलराम भी व्यग्र हो उठा। चंद्रमुखी को स्वयं भी संदेह होने लगा, शायद वह यहाँ नहीं है। फिर भी आशा के सहारे देवता के चरणों में तन-मन से प्रार्थना करती हुई दिन-पर-दिन बिताने लगी।
कलकत्ता आने के बाद डेढ़ महीना बीत चुका था। आज रात उसका भाग्य प्रसन्न हुआ। रात के ग्यारह बजे थे—निराश मन से घर लौट रही थी, देखा कि रास्ते के किनारे एक घर के सामने कोई अपने-आप में कुछ बड़बड़ा रहा है। चंद्रमुखी का हृदय धक् से रह गया। यह कंठ-स्वर तो परिचित है! करोड़ों लोगों के बीच भी चंद्रमुखी वह स्वर पहचान सकती थी। जगह ज़रा अँधेरी थी, उस पर वह आदमी नशे में धुत्त होकर औंधे मुँह पड़ा था। चंद्रमुखी पास जाकर उसके बदन पर हाथ रखकर बोली—तुम कौन हो जी, इस तरह पड़े हो?
आदमी ने सुर में कहा,—सुन री सखी, मन का मीत कहाँ; जो पाऊँ कान्हा-सा स्वामी—
चंद्रमुखी को अब संदेह नहीं रहा, पुकारा, देवदास?
देवदास ने उसी भाव में कहा, हूँ।
यहाँ क्यों पड़े हो, घर जाओगे?
नहीं, मजे में हूँ—
थोड़ी शराब पियोगे?
'पियूँगा' कहकर वह एकबारगी चंद्रमुखी के गले से लिपट गया, बोला—ऐसे दोस्त कौन हो बाबा तुम?
चंद्रमुखी की आँखों से आँसू बहने लगे। तब बड़े परिश्रम से लड़खड़ाता हुआ, उसका
गला पकड़े किसी तरह उठकर खड़ा हुआ और कुछ देर मुँह की ओर ताककर बोला, वाह! यह तो ख़ासी चीज़ है!
चंद्रमुखी के रुदन में हँसी मिल गई; बोली, हाँ, ख़ासी चीज़ हूँ; अभी फ़िलहाल मेरे कंधे का सहारा लेकर ज़रा आगे चलो, एक गाड़ी तो चाहिए।
वह तो चाहिए ही! रास्ते में आते-आते देवदास ने लड़खड़ाती ज़ुबान में कहा, सुंदरी, मुझे तुम पहचानती हो?
चंद्रमुखी ने कहा, पहचानती हूँ।
देवदास गा उठा,—दूजे लोग झाँसा देते हैं, भाग्य से मैं पहचानता हूँ—उसके बाद गाड़ी में बैठकर चंद्रमुखी के कंधे का सहारा लिए घर आ पहुँचा। दरवाज़े के पास खड़े होकर जेब में हाथ डालकर बोला, सुंदरी! बटोर तो लाईं, लेकिन जेब में तो कुछ है नहीं—
चंद्रमुखी चुपचाप उसका हाथ पकड़कर खींच लाई और सीधे बिस्तर पर लिटाकर बोली, सो जाओ।
देवदास ने वैसी ही लड़खड़ाती ज़ुबान में कहा, कुछ मतलब है क्या? अभी तो कहा जेब ख़ाली है,—कोई आशा नहीं। समझी रूपसी!
रूपसी समझ गई थी; बोली, कल दे देना।
देवदास बोला, इतना विश्वास तो ठीक नहीं—क्या चाहती हो, खुलकर बोलो तो?
चंद्रमुखी ने कहा, कल सुनना—कहकर पाशेर घरे चली गई।
देवदास जब नींद से जागा तो दिन चढ़ आया था। कमरे में कोई नहीं था।
चंद्रमुखी स्नान करके नीचे रसोई के काम में लग गई थी। देवदास ने देखा, इस कमरे में वह पहले कभी नहीं आया, एक भी चीज़ पहचान नहीं पा रहा था। उसे पिछली रात की कोई बात याद नहीं आ रही थी; केवल किसी की आत्मीय सेवा का स्मरण था। जैसे किसी ने बड़े स्नेह से खींचकर लाकर सुला दिया था। इसी समय चंद्रमुखी ने कमरे में प्रवेश किया। रात की साज-सज्जा में उसने काफ़ी परिवर्तन कर लिया था। बदन पर गहने तो थे, पर रंगीन कपड़े, माथे पर टीप, मुँह में पान का दाग—यह सब नहीं था। बिलकुल एक सादी-सी साड़ी पहनकर कमरे में घुसी थी। देवदास मुँह की ओर देखकर हँस पड़ा, कल कहाँ से मुझे डाका डालकर ले आईं?
चंद्रमुखी बोली, डाका नहीं डाला—सिर्फ़ रास्ते से बटोर लाई थी।
देवदास अचानक गंभीर होकर बोल उठा, वह तो ठीक है, लेकिन तुम्हारा यह सब फिर क्या! कब आईं? बदन पर तो गहने अँटते नहीं—दिए किसने?
चंद्रमुखी ने देवदास के मुख की ओर तीव्र दृष्टि से देखकर कहा, फिर!
देवदास हँसकर बोला, नहीं-नहीं—वह बात नहीं; एक मज़ाक करने में भी क्या दोष है? आईं कब? चंद्रमुखी बोली, डेढ़ महीना हुआ।
देवदास ने मन-ही-मन जैसे कुछ हिसाब किया। फिर कहा, जब हमारे घर गई थीं, उसके बाद ही आई हो?
चंद्रमुखी चकित होकर बोली, तुम्हारे घर गई थी—कैसे जाना?
देवदास ने कहा, तुम्हारे जाने के तुरंत बाद मैं घर गया था। एक दासी—जो तुम्हें बड़ी भाभी के पास ले गई थी, उसी से सुनने को मिला,—कल अश्वत्थझुरी गाँव से एक स्त्री आई थी, वह बड़ी सुंदर थी। और क्या समझने को बाक़ी रहता है! लेकिन इतने गहने फिर क्यों गढ़वाए?
चंद्रमुखी बोली, गढ़वाए नहीं, यह सब गिल्टी के गहने हैं, कलकत्ते आकर ख़रीदे हैं। फिर भी देखो तो, तुम्हारे लिए मुझे कितना फ़ालतू ख़र्च करना पड़ा! और कल तुम मुझे पहचान भी नहीं पाए।
देवदास हँस पड़ा; बोला, बिलकुल नहीं पहचान पाया, ऐसा नहीं, पर तुम्हारी सेवा को पहचान गया था। कई बार मन में आया था, मेरी चंद्रमुखी के सिवा इतनी सेवा और किसकी?
आनंद से चंद्रमुखी का रोने को मन हो आया। कुछ देर चुप रहकर बोली, देवदास, अब मुझे उतनी घृणा तो नहीं करते—न?
देवदास ने जवाब दिया, नहीं। बल्कि प्यार करता हूँ।
दोपहर में स्नान करते समय चंद्रमुखी ने देखा, देवदास के पेट पर फलालैन का एक टुकड़ा बँधा है। भयभीत होकर बोली, वह क्या, फलालैन क्यों बाँधा है?
देवदास बोला, पेट में ज़रा दर्द-सा लगता है—तुम ऐसे क्यों कर रही हो?
चंद्रमुखी ने कपाल पीटकर कहा, सर्वनाश तो नहीं कर बैठे? लिवर में दर्द तो नहीं हो गया?
देवदास हँसकर बोला, चंद्रमुखी, शायद वही हुआ है।
उसी दिन डॉक्टर आकर बहुत देर तक जाँच-पड़ताल करके ठीक यही आशंका व्यक्त कर गए, दवा दी, और बताया कि यदि पर्याप्त सावधानी न बरती गई तो भीषण अनिष्ट हो सकता है। अर्थ दोनों ही समझ गए। घर पर समाचार देकर धर्मदास को बुलवाया गया, इलाज के लिए बैंक से रुपये लाए गए। दो दिन यूँ ही बीते, किंतु तीसरे दिन उसे ज्वर आ गया।
देवदास ने चंद्रमुखी को बुलाकर कहा, ठीक समय पर आई, वरना शायद फिर देख भी नहीं पातीं।
आँसू पोंछकर चंद्रमुखी जी-जान से सेवा में जुट गई। हाथ जोड़कर प्रार्थना की, भगवान, इस बुरे समय में इतनी काम आऊँगी, यह आशा स्वप्न में भी नहीं की थी, किंतु देवदास को ठीक कर दो।
लगभग एक महीने से अधिक देवदास शय्या पर पड़ा रहा, उसके बाद धीरे-धीरे स्वास्थ्य-लाभ करने लगा, बीमारी अधिक गंभीर न हो सकी।
इसी समय एक दिन देवदास ने कहा, चंद्रमुखी, तुम्हारा नाम बहुत बड़ा है, हमेशा बुलाने में असुविधा होती है, —इसे ज़रा छोटा करना चाहता हूँ।
चंद्रमुखी बोली, अच्छी बात है।
देवदास ने कहा, तो आज से तुम्हें 'बहू' कहकर पुकारूँगा।
चंद्रमुखी हँस पड़ी। बोली, सो तो पुकार लिया, लेकिन उसका कोई मतलब तो होना चाहिए।
क्या सब बातों का मतलब होता है?
यदि साध हुई है, तो यही कहकर पुकारना, लेकिन यह साध क्यों हुई, यह भी नहीं बताओगे?
नहीं; कभी कारण पूछ भी नहीं सकोगी।
चंद्रमुखी ने गर्दन हिलाकर कहा, ठीक है, वही होगा।
देवदास बहुत देर चुप रहकर अचानक गंभीर भाव से प्रश्न कर बैठा, अच्छा बहू, तुम मेरी कौन हो जो इतने जी-जान से मेरी सेवा कर रही हो?
चंद्रमुखी लज्जावनत वधू नहीं थी, न ही अवाक्पटु बालिका; मुख की ओर स्थिर, शांत दृष्टि रखकर स्नेह-सिक्त कंठ से बोली, तुम मेरे सर्वस्व हो—यह क्या आज भी नहीं समझ पाए!
देवदास दीवार की ओर देख रहा था। उसी ओर दृष्टि रखे धीरे-धीरे कहने लगा, समझ तो गया हूँ, पर वैसी प्रसन्नता नहीं पाता। पार्वती को कितना चाहता हूँ, वह मुझे कितना चाहती है, किंतु फिर भी क्या कष्ट! बहुत दुःख पाकर सोचा था, फिर कभी इन फंदों में पाँव नहीं दूँगा; इच्छा करके दिया भी नहीं। किंतु तुमने ऐसा क्यों किया? ज़बरदस्ती मुझे क्यों बाँधा? कहकर फिर कुछ क्षण मौन रहकर बोला, बहू, तुम्हें भी शायद पार्वती की तरह ही कष्ट मिलेगा।
चंद्रमुखी ने मुँह पर आँचल रखकर शय्या के एक कोने में निःशब्द बैठी रही।
देवदास पुनः मृदु कंठ से कहने लगा, तुम दोनों में कितनी विषमता है, और फिर कितनी समता भी। एक अभिमानी, उद्धत, और दूसरी कितनी शांत, कितनी संयत। वह कुछ भी सह नहीं सकती, और तुम कितना सहती हो! उसका कितना यश, कितनी सुनाम, और तुम्हारा कितना कलंक! सब उसे कितना प्यार करते हैं, और कोई तुम्हें प्यार नहीं करता। पर मैं करता हूँ, करता क्यों नहीं! कहकर एक मोटी, लंबी साँस लेकर पुनः बोला, पाप-पुण्य का विचार करने वाले तुम्हारा क्या विचार करेंगे, नहीं जानता; किंतु मृत्यु के बाद यदि फिर मिलन हुआ, तो मैं तुमसे कभी दूर नहीं रह पाऊँगा।
चंद्रमुखी चुपचाप रो-रोकर बुक भासाइय़ा दिल; मने मने प्रार्थना करिते लागिल, भगवान, कोनकाले, कोन जन्मे यदि ए पापिष्ठार प्राय़श्चित्त हय़, आमाके येन एइ पुरस्कार दिय़ो।
दो महीने बीत चुके हैं। देवदास ने आरोग्य लाभ कर लिया है, किंतु शरीर सुधरा नहीं है। हवा-पानी बदलना आवश्यक है। कल पश्चिम घूमने जाएगा, साथ में केवल धर्मदास जाएगा।
चंद्रमुखी ने ज़िद पकड़ ली थी, तुम्हें एक दासी की भी तो ज़रूरत होगी, मुझे साथ जाने दो।
देवदास बोला, छिः, यह नहीं हो सकता! और चाहे जो करूँ, इतना बड़ा निर्लज्ज नहीं हो सकता।
चंद्रमुखी एकदम मौन हो गई। वह नासमझ नहीं थी, इसलिए तुरंत समझ गई। कुछ भी हो, इस संसार में उसका कोई सम्मान नहीं है। उसके संसर्ग में देवदास को सुख मिलेगा, सेवा मिलेगी, किंतु कभी सम्मान नहीं मिलेगा। आँसू पोंछकर बोली, फिर कब भेंट होगी?
देवदास ने कहा, कह नहीं सकता, पर जीते-जी तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा, तुम्हें देखने की तृष्णा मेरी कभी नहीं मिटेगी।
प्रणाम करके चंद्रमुखी हटकर खड़ी हो गई। चुपके से बोली, यही मेरे लिए बहुत है। इससे अधिक आशा नहीं करती।
जाते समय देवदास ने दो हज़ार रुपये और चंद्रमुखी के हाथ में देकर कहा, रख लो। मनुष्य के शरीर का तो कोई भरोसा नहीं; अंत में तुम क्या अकूल में बहोगी!
चंद्रमुखी यह भी समझ गई, इसलिए हाथ पसारकर धन ग्रहण कर लिया। आँसू पोंछकर पूछा, तुम एक बात मुझे बता जाओ—
देवदास ने उसके मुख की ओर देखकर कहा, क्या?
चंद्रमुखी बोली, बड़ी भौजाई कह रही थीं, तुम्हारे शरीर में कोई ख़राब रोग हो गया है—यह क्या सच है?
प्रश्न सुनकर देवदास दुःखी हुआ; बोला, बड़ी बहू सब कुछ कर सकती हैं; लेकिन वैसा होता तो क्या तुम न जानतीं? मेरी कौन-सी बात तुम्हें मालूम नहीं? इस विषय में तो तुम पार्वती से भी बढ़कर हो।
चंद्रमुखी ने एक बार और आँसू पोंछकर कहा, बच गई। लेकिन फिर भी बहुत सावधान रहना। तुम्हारा शरीर यों ही कमज़ोर है, उस पर देखो, किसी दिन भूल मत कर बैठना।
प्रत्युत्तर में देवदास केवल हँसा, कुछ बोला नहीं।
चंद्रमुखी बोली, और एक भिक्षा—देह ज़रा-सी भी ख़राब हो तो मुझे ख़बर दोगे, बोलो?
देवदास ने उसके मुख की ओर देखकर गर्दन हिलाकर कहा—दूँगा क्यों नहीं, बहू!
एक बार और प्रणाम कर चंद्रमुखी रोती हुई दूसरे कमरे में भाग गई।
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