देवदास লিখেছেন Matribhasa Hindi
पहला परिच्छेद
वैशाख की एक दुपहरी में धूप का न अंत था, न उत्ताप की कोई सीमा। ठीक उसी समय मुखर्जियों का देवदास पाठशाला के कमरे के एक कोने में फटी चटाई पर बैठा, स्लेट हाथ में लिए, आँखें खोले-मूँदे, पाँव फैलाए, जमाइयाँ लेता हुआ, अंततः अचानक बड़ा विचारशील हो उठा; और पल भर में उसने यह निश्चय कर लिया कि इस परम मनोरम समय में मैदान-मैदान पतंग उड़ाते फिरने के बजाय पाठशाला में बंद रहना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है। उसके उपजाऊ दिमाग में तुरंत एक उपाय भी सूझ गया। वह स्लेट हाथ में लिए खड़ा हो गया।
पाठशाला में इस समय आधी छुट्टी का अवकाश था। बालकों की टोली तरह-तरह की भंगिमाएँ बनाती, उछलती-कूदती, कुछ ही दूरी पर बरगद के पेड़ के नीचे गुल्ली-डंडा खेल रही थी। देवदास ने एक बार उधर देखा। आधी छुट्टी का अवकाश उसे नहीं मिलता था—क्योंकि गोविंद पंडित कई बार देख चुके थे कि एक बार पाठशाला से बाहर निकलकर पुन: भीतर आना देवदास को अत्यंत अप्रिय था। उसके पिता की भी मनाही थी। अनेक कारणों से यही तय हुआ था कि इस समय वह सरदार-छात्र भूलू की देखरेख में रहेगा।
इस समय कमरे के भीतर केवल पंडित जी दोपहर के आलस में आँखें मूँदे पड़े सो रहे थे, और सरदार-छात्र भूलू एक कोने में हाथ-पाँव टूटी एक बेंत की सीट वाली बेंच पर छोटा-मोटा पंडित बना बैठा था। बीच-बीच में वह अत्यंत उपेक्षा भाव से कभी लड़कों का खेल देखता, तो कभी देवदास और पार्वती पर आलस-भरी तिरछी नज़र डाल लेता। पार्वती को पंडित जी के आश्रय और देखरेख में आए अभी महीना-भर ही हुआ था। पंडित जी ने संभवतः इस अल्पकाल में ही उसका मन पूरी तरह जीत लिया था; इसीलिए वह तन्मय होकर, बड़े धैर्य के साथ, सोते हुए पंडित जी का रेखाचित्र अपनी 'बोधोदय' पुस्तक के अंतिम पृष्ठ पर स्याही से उकेर रही थी, और किसी कुशल चित्रकार की भाँति भाँति-भाँति से देख रही थी कि उसका यह अत्यंत जतन से बनाया चित्र आदर्श (मूल) से कितना मेल खाता है। बहुत अधिक मेल तो नहीं था, किंतु पार्वती इसी में पर्याप्त आनंद और आत्मसंतोष का अनुभव कर रही थी।
इसी समय देवदास स्लेट हाथ में लेकर उठ खड़ा हुआ और भूलू को संबोधित करते हुए बोला, "सवाल नहीं बन रहा।"
भूलू ने शांत और गंभीर मुँह बनाकर कहा, "कौन-सा सवाल?"
"मन-कसा..."
"ला, स्लेट देखूँ—"
भाव यह था कि उसके लिए ऐसे कामों में बस स्लेट का हाथ में आने भर की देर है। देवदास उसके हाथ में स्लेट देकर पास खड़ा हो गया। भूलू बोल-बोलकर लिखने लगा—एक मन तेल का दाम यदि चौदह रुपये नौ आने तीन गंडा हो, तो—
ऐन इसी वक्त एक घटना घटी। उस हाथ-पाँव टूटी बेंच पर सरदार-छात्र अपनी पद-मर्यादा के उपयुक्त स्थान चुनकर नियमानुसार आज तीन वर्षों से प्रतिदिन बैठता आ रहा था। उसके पीछे चूने का एक बड़ा ढेर लगा हुआ था। पंडित जी ने कब, किस युग में इसे कौड़ियों के भाव खरीदकर रखा था; मन में अभिलाषा थी कि दिन अच्छे आएँगे तो इससे पक्का मकान-दालान बनवाएँगे। वह शुभ दिन कब आएगा, यह कोई नहीं जानता। परंतु इस श्वेत चूर्ण के प्रति पंडित जी की सतर्कता और जतन की कोई सीमा न थी। संसार-अनभिज्ञ, अपरिणामदर्शी कोई कुलक्षण बालक इसका एक कण भी नष्ट न कर दे, इसलिए उनके प्रियपात्र और अपेक्षाकृत वयस में बड़े भोलानाथ को इस सँजोए हुए ढेर की रखवाली का भार मिला था, और इसीलिए वह बेंच पर बैठकर इसकी पहरेदारी किया करता था।
भोलानाथ लिख रहा था—एक मन तेल का दाम यदि चौदह रुपये नौ आने तीन गंडा हो, तो—"ओगो बाप रे बाप!"—इसके बाद ज़ोरदार धड़ाका और शोर हुआ। पार्वती अत्यंत ऊँचे स्वर में चीखती हुई, तालियाँ बजा-बजाकर ज़मीन पर लोट-पोट होने लगी। नींद से तुरंत जागे गोविंद पंडित लाल-लाल आँखों से तड़ाक से उठ खड़े हुए; देखा कि पेड़ के नीचे लड़कों का दल का दल एक पंक्ति बनाकर हूल-हूल का शोर मचाता हुआ भागा जा रहा है, और तभी उनकी नज़र पड़ी कि टूटी बेंच पर एक जोड़ी पैर नाच रहे हैं और चूने के ढेर में मानो ज्वालामुखी का विस्फोट हो रहा है। वह चिल्ला उठे, "क्या—क्या—क्या रे!"
बताने के लिए केवल पार्वती ही वहाँ मौजूद थी। किंतु वह तो इस समय ज़मीन पर लोट रही थी और तालियाँ पीट रही थी। पंडित जी का निष्फल प्रश्न क्रुद्ध होकर गूँज उठा, "क्या, क्या—क्या रे!"
इसके बाद श्वेत-मूर्ति बना भोलानाथ चूना हटाकर उठ खड़ा हुआ। पंडित जी फिर चिल्लाए, "अबे गोबर के कीड़े, तू!—तू उसके भीतर!"
"अँया—अँया—अँया—"
"फिर वही!"
"देवा साला... धक्का देकर... अँया—अँया... मन-कसा..."
"फिर रोता है बे गोबर के कीड़े!"
किंतु अगले ही क्षण सारा माजरा समझकर, चटाई पर बैठते हुए उन्होंने पूछा, "देवा धक्का देकर गिराकर भाग गया?"
भूलू और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा—"अँया—अँया—अँया—"
इसके बाद बहुत देर तक चूना झाड़ा-पोंछा गया, किंतु सफ़ेद और काले रंग में लिपटा वह सरदार-छात्र कुछ-कुछ भूत-जैसा दिखाई देने लगा, और तब भी उसका रोना बंद न हुआ।
पंडित बोले, "देवा धक्का देकर भाग गया? अच्छा!"
भूलू बोला, "अँया—अँया—"
पंडित बोले, "इसका बदला लूँगा।"
भूलू ने कहा, "अँया—अँया—अँया—"
पंडित ने पूछा, "वह छोरा कहाँ है?"
इसके बाद लड़कों का दल लाल-लाल चेहरों के साथ हाँफता-हाँफता लौटा और उसने बताया, "देवा को पकड़ा नहीं जा सका। उफ़! कैसा ईंट चलाता है...!"
"पकड़ा नहीं गया?"
एक दूसरे बालक ने पहली बात की पुनरावृत्ति की, "उफ़! जैसा..."
"चुप रह बे!"
वह ढोक निगलकर एक तरफ़ हट गया। अपने निष्फल क्रोध में पंडित जी ने पहले तो पार्वती को बहुत डाँटा-डपटा, फिर भोलानाथ का हाथ पकड़कर बोले, "चल, एक बार कचहरी-घर चलकर बाबू साहब से कह आते हैं।"
इसका आशय यह था कि जमींदार नारायण मुखर्जी से उनके बेटे की करतूत की शिकायत करेंगे।
उस समय दोपहर के तीन बजे के आसपास का वक्त था। नारायण मुखर्जी महाशय बाहर बैठकर गुड़गुड़ी से तंबाकू पी रहे थे और एक नौकर हाथ का पंखा लेकर उन्हें हवा झेल रहा था। छात्र सहित पंडित जी के इस असमय आगमन से कुछ चकित होकर बोले, "गोविंद! तुम?"
गोविंद जाति से कायस्थ थे—उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया और भूलू को दिखाकर सारी बात विस्तार से कह सुनाई। मुखर्जी महाशय खिन्न हुए; बोले, "यह तो बड़ा बुरा हुआ, देखता हूँ देवदास तो शासन से बाहर निकल गया!"
"क्या करूँ, आप हुक्म कीजिए।"
जमींदार बाबू ने गुड़गुड़ी की नली रखकर कहा, "कहाँ गया वह?"
"वह मैं क्या जानूँ! जो पकड़ने गए थे, उन्हें ईंट मारकर भगा दिया।"
वे दोनों ही कुछ देर चुप रहे। नारायण बाबू बोले, "घर आने दो, जो करना होगा करूँगा।"
गोविंद अपने छात्र का हाथ थामकर पाठशाला लौट आए और अपने मुख और आँखों की भंगिमाओं से पूरी पाठशाला को संत्रस्त कर दिया, तथा यह प्रतिज्ञा की कि देवदास के पिता भले ही उस अंचल के जमींदार हों, पर अब वे उसे पाठशाला में पाँव तक न रखने देंगे। उस दिन पाठशाला की छुट्टी कुछ पहले ही हो गई; जाते समय लड़के आपस में तरह-तरह की बातें करने लगे।
एक ने कहा, "उफ़! देवा कितना साँड़ है, देखा तुमने!"
दूसरे ने कहा, "भूलू को अच्छा सबक़ सिखाया।"
"उफ़, क्या ढेले चलाता है!"
तीसरे ने भूलू की तरफ़दारी करते हुए कहा, "देखना, भूलू बदला ज़रूर लेगा।"
"इश्स—अब वह पाठशाला आए तब न बदला लेगा!"
बालकों के इस छोटे से झुंड के एक तरफ़ पार्वती भी अपनी किताबें-स्लेट समेटे घर लौट रही थी। उसने पास चल रहे एक लड़के का हाथ पकड़कर पूछा, "मणि, क्या देव-दादा को सचमुच अब पाठशाला नहीं आने देंगे?"
मणि ने कहा, "नहीं—किसी क़ीमत पर नहीं।"
पार्वती एक तरफ़ हट गई—यह बात उसे शुरू से ही अच्छी नहीं लग रही थी।
पार्वती के पिता का नाम नीलकांत चक्रवर्ती था। चक्रवर्ती महाशय जमींदार के पड़ोसी थे, यानी मुखर्जी महाशय की बड़ी-सी हवेली के बगल में उनका छोटा और पुराना, पुराने ज़माने का ईंटों का मकान था। उनके पास दो-चार बीघा ज़मीन-जायदाद थी, दो-चार घर यजमान थे, और जमींदार-हवेली से मिलने वाली आस-उम्मीद बनी रहती थी—भला-चंगा सुखी परिवार था, गुज़र-बसर अच्छी कट रही थी।
सबसे पहले धर्मदास से पार्वती की भेंट हुई। वह देवदास के घर का नौकर था। देवदास के एक वर्ष का होने से लेकर आज बारह वर्ष की अवस्था तक वही उसे सँभालता आया था—पाठशाला पहुँचा आता और छुट्टी के समय साथ लिवाकर घर लाता। यह काम वह नियमपूर्वक प्रतिदिन करता था और आज भी उसी के लिए पाठशाला जा रहा था। पार्वती को देखकर बोला, "क्यों पारू, तेरा देव-दादा कहाँ है?"
"भाग गए—"
धर्मदास अत्यंत चकित होकर बोला, "भाग गए क्या रे?"
तब पार्वती को भोलानाथ की उस दुर्दशा की याद आ गई और वह नए सिरे से हँसने लगी, "देख धरमा, देव-दादा ने... खी-खी-खी... सीधे चूने के ढेर में... खी-खी... हू-हू... बिलकुल धड़ाम से चित्त कर दिया..."
धर्मदास पूरी बात न समझ सका, फिर भी उसकी हँसी देखकर थोड़ा हँस लिया; फिर हँसी रोककर हठपूर्वक बोला, "बता न पारू, क्या हुआ है?"
"देव-दादा ने धक्का देकर गिरा दिया... भूलू को... चूने के ढेर में... खी-खी-खी..."
धर्मदास अब बाकी बात समझ गया और बहुत चिंतित होकर बोला, "पारू, वह अब कहाँ है, तुझे पता है?"
"मुझे क्या मालूम!"
"तू जानती है—बता दे। बेचारे को शायद बहुत भूख लगी होगी।"
"भूख तो लगी ही होगी—पर मैं नहीं बताऊँगी।"
"क्यों नहीं बताएगी?"
"बता दिया तो मुझे बहुत मारेंगे। मैं ख़ुद खाना दे आऊँगी।"
धर्मदास कुछ आश्वस्त हुआ—बोला, "अच्छा, दे आना; और शाम होने से पहले बहला-फुसलाकर घर लिवा लाना।"
"ले आऊँगी।"
घर पहुँचकर पार्वती ने देखा कि उसकी माँ और देवदास की माँ दोनों ही सारी बात सुन चुकी हैं। उससे भी इस बारे में पूछा गया। वह हँसते-हँसते फिर गंभीर होकर जितना बता सकी, बता दिया। उसके बाद वह आँचल में भुने हुए चावल बाँधकर जमींदार के आम के बाग़ में चली गई। बाग़ उनके घर के पास ही था, और उसके एक कोने में बाँस की झाड़ी थी। वह जानती थी कि छिपकर तंबाकू पीने के लिए देवदास ने उस बाँस के झुरमुट में थोड़ी जगह साफ़ कर रखी थी। भागकर छिप रहने का उसका यही गुप्त स्थान था। भीतर जाकर पार्वती ने देखा कि बाँस की झाड़ी में देवदास एक छोटा-सा हुक्का हाथ में लिए बैठा है और किसी अनुभवी वृद्ध की भाँति कश खींच रहा है। चेहरा बड़ा गंभीर था—अत्यधिक चिंता के चिह्न उस पर दिखाई दे रहे थे। पार्वती को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ, किंतु प्रकट नहीं होने दिया। हुक्के के कश खींचते हुए बड़े गंभीर भाव से बोला, "आ।"
पार्वती पास आकर बैठ गई। आँचल में जो बँधा था, उस पर तुरंत देवदास की नज़र पड़ गई। बिना कुछ पूछे ही उसने उसे खोलकर खाना शुरू कर दिया और बोला, "पारू, पंडित जी ने क्या कहा रे?"
"बड़े-बाबू से शिकायत कर दी है।"
देवदास ने हुक्का नीचे रखा और आँखें फाड़कर कहा, "पिताजी से कह दिया?"
"हाँ।"
"फिर?"
"तुम्हें अब पाठशाला नहीं जाने देंगे।"
"मैं पढ़ना भी नहीं चाहता।"
इस समय उसका खाना लगभग समाप्त हो चला था; देवदास ने पार्वती के चेहरे की ओर देखकर कहा, "संदेह (मिठाई) दे।"
"संदेह तो मैं नहीं लाई।"
"तो पानी दे।"
"पानी कहाँ से लाऊँ?"
झल्लाकर देवदास बोला, "कुछ भी नहीं है, तो फिर आई क्यों? जा, पानी लेकर आ।"
उसका रूखा स्वर पार्वती को अच्छा न लगा; बोली, "मैं दुबारा नहीं जा सकती—चलो, तुम घर चलकर खा-पी लो।"
"क्या मैं इस समय जा सकता हूँ?"
"तो क्या यहीं रहोगे?"
"यहीं रहूँगा, फिर चला जाऊँगा—"
पार्वती का मन उदास हो गया। देवदास का यह आपातातीत वैराग्य देखकर और उसकी बातें सुनकर उसकी आँखों में आँसू आ रहे थे; बोली, "देव-दादा, मैं भी चलूँगी।"
"कहाँ? मेरे साथ? धत्त—ऐसे कहीं होता है?"
पार्वती ने सिर हिलाकर कहा, "मैं तो जाऊँगी ही—"
"नहीं—तुझे नहीं जाना—तू पहले पानी लेकर आ—"
पार्वती ने फिर सिर हिलाकर कहा, "मैं तो जाऊँगी ही—"
"पहले पानी तो ला—"
"मैं नहीं जाऊँगी—तुम तब तक भाग जाओगे।"
"नहीं—नहीं भागूँगा।"
किंतु पार्वती उसकी बात का विश्वास न कर सकी, इसलिए बैठी ही रही। देवदास ने पुन: हुक्म दिया, "जा, जो कह रहा हूँ।"
"मैं नहीं जा सकती।"
ग़ुस्से में आकर देवदास ने पार्वती के बाल पकड़कर खींच दिए और डाँटा—"जा, जो कह रहा हूँ!"
पार्वती चुपचाप बैठी रही। इसके बाद उसकी पीठ पर एक मुक्का पड़ा—"नहीं जाएगी?"
पार्वती रो पड़ी—"मैं किसी सूरत में नहीं जाऊँगी।"
देवदास एक तरफ़ चला गया। पार्वती भी रोती-रोती सीधे देवदास के पिता के सामने जा पहुँची। मुखर्जी महाशय पार्वती को बहुत प्यार करते थे। बोले, "पारू, रो क्यों रही है, बेटी?"
"देव-दादा ने मारा है।"
"कहाँ है वह?"
"उसी बाँस के बाग़ में बैठकर तंबाकू पी रहा था।"
एक तो पंडित जी के आने के समय से ही वे बिगड़े बैठे थे—अब इस समाचार ने उन्हें सर्वथा अग्नि-मूर्ति बना दिया। बोले, "देवा क्या फिर तंबाकू पीता है?"
"हाँ, पीता है, रोज़ पीता है। बाँस के बाग़ में उसका हुक्का छिपा रखा है—"
"इतने दिन मुझे क्यों नहीं बताया?"
"देव-दादा मारेंगे, इसलिए।"
बात किंतु पूरी तरह ऐसी नहीं थी। भेद खोल देने पर कहीं देवदास को सज़ा न भुगतनी पड़े, इस डर से उसने कभी कुछ नहीं कहा था। आज यह बात उसने केवल ग़ुस्से के आवेश में कह दी थी। अभी उसकी कुल आठ वर्ष की आयु थी—क्रोध अभी बहुत तेज़ था; किंतु इतने पर भी उसकी बुद्धि-समझ कुछ कम न थी। घर जाकर खाट पर पड़े-पड़े बहुत देर रोने-धोने के बाद वह सो गई,—उस रात उसने भात तक नहीं खाया।
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