देवदास by Matribhasa Hindi
सोलहवाँ परिच्छेद
कलकत्ता छोड़कर जब देवदास कुछ दिन इलाहाबाद में रह रहा था, तब अचानक एक दिन उसने चंद्रमुखी को पत्र लिखा था, सोचा था, अब फिर कभी प्रेम नहीं करूँगा। एक तो प्रेम करके ख़ाली हाथ लौटना ही बड़ी यातना है, उस पर फिर से नए सिरे से प्रेम करने जाने जैसी विडंबना संसार में और नहीं।
प्रत्युत्तर में चंद्रमुखी ने क्या लिखा था, उससे कोई प्रयोजन नहीं; किंतु इस समय देवदास के मन में बस यही आता रहता था कि काश, वह एक बार आ जाती!
अगले ही क्षण वह भय से सोचता—नहीं नहीं, इसकी कोई ज़रूरत नहीं—कहीं किसी दिन पार्वती को पता चल गया तो! इसी प्रकार एक बार पार्वती, एक बार चंद्रमुखी उसके हृदय-राज्य पर अधिकार किए रहती थीं। कभी-कभी तो दोनों के चेहरे उसके हृदय-पटल पर साथ-साथ उभर आते—मानो दोनों में कितना सद्भाव हो!
मन के भीतर दोनों साथ-साथ ही विराजती थीं। किसी-किसी दिन तो अकस्मात् ऐसा लगता, मानो वे दोनों ही सो गई हों। ऐसे समय उसका मन इतना अंतःसारशून्य हो जाता कि बस एक निर्जीव अतृप्ति ही उसके मन के भीतर एक झूठी प्रतिध्वनि की तरह गूँजती रहती। इसके बाद देवदास लाहौर चला गया। चुन्नीलाल वहीं काम करता था, पता पाकर मिलने आया। बहुत दिनों बाद देवदास ने फिर मदिरा को स्पर्श किया। चंद्रमुखी याद आई, उसने मना किया था। मन में होता, कितनी बुद्धि है उसमें। वह कितनी शांत, कितनी धीर है; और उसका स्नेह कितना गहरा है। पार्वती अब सो चुकी थी—बस बुझती हुई दीपशिखा की भाँति कभी-कभी जल-जल उठती थी। किंतु यहाँ की आबोहवा उसे रास न आई। बीच-बीच में तबीयत ख़राब हो जाती, पेट के पास फिर से दर्द-सा महसूस होता। धर्मदास एक दिन रोआँसा होकर बोला, “देवता, आपकी तबीयत फिर ख़राब हो रही है—कहीं और चलिए।”
देवदास ने अन्यमनस्क भाव से जवाब दिया, “चलो चलते हैं।”
देवदास प्रायः डेरे पर शराब नहीं पीता था। चुन्नीलाल के आने पर किसी दिन पी लेता, किसी दिन बाहर निकल जाता। आधी रात गए घर लौटता, किसी-किसी रात तो बिलकुल ही नहीं लौटता। आज दो दिन से वह अचानक गायब था। रो-रोकर धर्मदास ने अन्न-जल त्याग दिया। तीसरे दिन देवदास बुख़ार लेकर लौटा; बिस्तर पकड़ा तो फिर उठ न सका। तीन-चार डॉक्टर आकर चिकित्सा करने लगे।
धर्मदास ने कहा, “देवता, काशी में माँ को ख़बर कर दूँ?”
देवदास ने जल्दी से उसे रोकते हुए कहा, “छी-छी—क्या यह मुँह माँ को दिखा सकता हूँ?”
धर्मदास ने प्रतिवाद किया, “रोग-शोक तो सभी को होते हैं; पर क्या इसलिए इतने बड़े संकट के समय माँ से भी छिपाया जाता है? इसमें कोई लाज की बात नहीं, देवता, काशी चलिए।”
देवदास ने मुँह फेरकर कहा, “नहीं धर्मदास, इस समय मैं उनके पास नहीं जा सकूँगा। ठीक हो जाऊँ, उसके बाद।”
धर्मदास ने एक बार सोचा कि चंद्रमुखी का ज़िक्र करे; किंतु वह स्वयं उससे इतनी घृणा करता था कि उसका चेहरा याद आते ही चुप रह गया।
देवदास के मन में भी कई बार यह बात आई; किंतु कुछ भी कहने की इच्छा न हुई। अतः कोई नहीं आया। फिर बहुत दिनों बाद वह धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगा। एक दिन उसने उठकर बैठते हुए कहा, “चलो धर्मदास, अब कहीं और चलें।”
“संकट के समय माँ से भी छिपाया जाता है? इसमें कोई लाज की बात नहीं, देवता, काशी चलिए।”
सामान बाँधकर, चुन्नीलाल से विदा लेकर, देवदास फिर इलाहाबाद आ पहुँचा—शरीर अब काफ़ी बेहतर था। कुछ दिन रहने के बाद एक दिन देवदास बोला, “धर्म, किसी नई जगह चलें तो कैसा हो? बंबई कभी नहीं देखी, चलोगे?”
उसका आग्रह देखकर, अनिच्छा होते हुए भी धर्मदास ने सहमति दे दी। ज्येष्ठ का महीना था, बंबई शहर उतना गर्म नहीं था। यहाँ आकर देवदास काफ़ी सँभल गया।
धर्मदास ने पूछा, “अब घर चलें तो?”
देवदास ने कहा, “नहीं, मैं ख़ूब मज़े में हूँ। यहीं कुछ दिन और रहूँगा।”
एक वर्ष बीत चुका था। भादों महीने की सुबह, एक दिन देवदास धर्मदास के कंधे का सहारा लेकर बंबई के अस्पताल से बाहर निकला और गाड़ी में आकर बैठ गया। धर्मदास बोला, “देवता, मैं तो कहता हूँ, माँ के पास चलना ही ठीक है।”
देवदास की दोनों आँखें आँसुओं से भर गईं—आज कई दिनों से उसे बस माँ की ही याद आ रही थी। अस्पताल में पड़े-पड़े जब-तब यही सोचा करता था,—इस संसार में उसका सब कुछ है, पर कोई नहीं है। उसकी माँ हैं, बड़े भाई हैं, बहन से भी बढ़कर पार्वती है—चंद्रमुखी भी है! उसके सब हैं, किंतु वह अब किसी का नहीं है। धर्मदास भी रो रहा था; बोला, “तो फिर दादा, माँ के पास चलना ही तय रहा?”
देवदास ने मुँह फेरकर आँसू पोंछे; बोला, “नहीं धर्मदास, माँ को यह मुँह दिखाने की इच्छा नहीं होती—मेरा वह समय शायद अभी नहीं आया।”
वृद्ध धर्मदास दहाड़ मारकर रो पड़ा, “दादा, माँ अभी जीवित तो हैं!”
इस बात ने कितना कुछ कह दिया, यह उन दोनों ने ही अपने भीतर अनुभव किया। देवदास की अवस्था अत्यंत ख़राब हो चुकी थी। पूरा पेट तिल्ली और जिगर से भर गया था; ऊपर से बुख़ार, खाँसी। रंग गहरा काला, शरीर अस्थिचर्म मात्र। आँखें भीतर धँस गई थीं, बस एक अस्वाभाविक चमक से झिलमिला रही थीं। सिर के बाल रूखे और सीधे—कोशिश करने पर शायद गिने जा सकते थे। हाथ की उँगलियों की ओर देखने से घृणा होती थी—एक तो क्षीण, तिस पर किसी कुत्सित रोग के दाग़ों से भरी हुई। स्टेशन पहुँचकर उसने पूछा, “कहाँ का टिकट ख़रीदूँ, देवता?”
देवदास ने सोच-विचारकर कहा, “चलो, घर ही चलते हैं—उसके बाद सब होगा।”
गाड़ी का समय होने पर वे हुगली का टिकट ख़रीदकर बैठ गए।
धर्मदास देवदास के पास ही रहा। शाम से पहले देवदास की आँखों में जलन होने लगी और फिर बुख़ार आ गया। उसने धर्मदास को बुलाकर कहा, “धर्मदास, आज लगता है, घर पहुँचना भी शायद मुश्किल होगा।”
धर्मदास ने भयभीत होकर कहा, “क्यों दादा?”
देवदास ने हँसने की चेष्टा करके केवल इतना कहा, “फिर से बुख़ार आ गया, धर्मदास।”
जब गाड़ी काशी का मार्ग पार कर गई, देवदास तब बुख़ार में अचेत था। पटना के पास उसे होश आया, बोला, “हाय रे धर्मदास, माँ के पास जाना सचमुच न हो सका।”
धर्मदास ने कहा, “चलिए दादा, हम पटना में ही उतरकर डॉक्टर को दिखा लें—”
उत्तर में देवदास बोला, “नहीं, रहने दो, हम घर ही चलें।”
गाड़ी जब पांडुआ स्टेशन पर पहुँची, तब भोर हो रही थी। रात भर वर्षा हुई थी, अब थम गई थी। देवदास उठकर खड़ा हुआ। नीचे धर्मदास सो रहा था। उसने धीरे से एक बार उसके माथे को छुआ, लज्जा के कारण उसे जगा नहीं सका। फिर द्वार खोलकर आहिस्ते से बाहर निकल गया। गाड़ी सोए हुए धर्मदास को लेकर चली गई। काँपते-काँपते देवदास स्टेशन के बाहर आया। एक घोड़ा-गाड़ी के कोचवान को बुलाकर बोला, “बापू, हाथीपोता ले चलोगे?”
उसने एक बार देवदास के चेहरे की ओर देखा, एक बार इधर-उधर देखा, फिर कहा, “नहीं बाबू, रास्ता ठीक नहीं है—इस बरसात में घोड़ा-गाड़ी वहाँ नहीं जा पाएगी।”
देवदास ने उद्बिग्न होकर पूछा, “पालकी मिल जाएगी?”
कोचवान बोला, “नहीं।”
आशंका से देवदास वहीं बैठ गया—तो क्या जाना नहीं हो पाएगा? उसके चेहरे पर ही उसकी अंतिम अवस्था गहरे अक्षरों में अंकित थी, अंधा भी उसे पढ़ सकता था।
कोचवान द्रवित होकर बोला, “बाबू, एक बैलगाड़ी ठीक कर दूँ?”
देवदास ने पूछा, “कितनी देर में पहुँचाएगी?”
कोचवान बोला, “रास्ता ख़राब है बाबू, शायद दो दिन लग जाएँगे।”
देवदास मन-ही-मन हिसाब करने लगा, दो दिन जीऊँगा तो? लेकिन पार्वती के पास जाना ही होगा। उसे अपने बहुत दिनों के बहुत-से झूठे बोल, बहुत-से झूठे आचरण याद आए। किंतु अंतिम दिन की यह प्रतिज्ञा तो सत्य करनी ही होगी। जैसे भी हो, एक बार उसे अंतिम दर्शन देने ही होंगे! पर इस जीवन की मियाद जो अब अधिक शेष नहीं! यही तो सबसे बड़े भय की बात थी!
देवदास जब बैलगाड़ी में चढ़कर बैठा, तब अपनी जननी की बात याद करके उसकी आँखों से आँसू फूट पड़े। और एक स्नेह-कोमल मुखड़ा आज जीवन के अंतिम क्षण में अत्यंत पवित्र होकर दिखाई दिया—वह चेहरा चंद्रमुखी का था। जिसे पापिष्ठा कहकर उसने सदा घृणा की थी, आज उसी को अपनी माँ के पास सगौरव खिलते देखकर उसकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। इस जीवन में अब भेंट न होगी, शायद बहुत दिनों तक उसे ख़बर भी न मिलेगी। फिर भी पार्वती के पास जाना होगा। देवदास ने शपथ खाई थी, एक बार और अवश्य मिलेगा। आज यह प्रतिज्ञा उसे पूरी करनी ही होगी। रास्ता ठीक नहीं था। वर्षा का पानी कहीं रास्ते के बीच जमा था, कहीं रास्ता टूट गया था। कीचड़ से सारा मार्ग भरा था। बैलगाड़ी हटर-हटर करती चली। कहीं उतरकर पहिया ठेलना पड़ा, कहीं बैलों को निर्दयता से पीटना पड़ा—जैसे भी हो, यह सोलह कोस का मार्ग पार करना ही होगा। सनसनाती ठंडी हवा बह रही थी। आज भी शाम के बाद उसे तेज़ बुख़ार आ गया। उसने भयभीत होकर पूछा, “गाड़ीवान, और कितना रास्ता है?”
गाड़ीवान ने जवाब दिया, “अभी आठ-दस कोस और है बाबू।”
“जल्दी ले चल बापू, तुझे बहुत इनाम दूँगा।” जेब में सौ रुपए का एक नोट था, उसे दिखाकर बोला, “सौ रुपए दूँगा, ले चल।”
उसके बाद कैसे और कहाँ से सारी रात बीत गई, देवदास जान भी न सका। वह संज्ञाहीन, अचेत था; सुबह होश आने पर बोला, “अरे, और कितना रास्ता है? यह क्या कभी ख़त्म नहीं होगा?”
गाड़ीवान ने कहा, “अभी छह कोस और।”
देवदास ने लंबी साँस छोड़कर कहा, “ज़रा जल्दी चल बापू, अब और समय नहीं है।”
गाड़ीवान समझ नहीं पाया, किंतु नए उत्साह से बैलों को हाँकते और गालियाँ देते हुए चल पड़ा। गाड़ी अपनी पूरी शक्ति से दौड़ रही थी, भीतर देवदास छटपटा रहा था। बस मन में यही हो रहा था, भेंट होगी तो? पहुँचूँगा तो? दोपहर में गाड़ी रोककर गाड़ीवान ने बैलों को चारा दिया, स्वयं भोजन किया और फिर आकर बैठ गया। बोला, “बाबू, तुम कुछ खाओगे नहीं?”
“नहीं बापू, पर प्यास बहुत लगी है, थोड़ा पानी दे सकते हो?”
उसने रास्ते के किनारे के पोखर से पानी लाकर दिया। आज शाम को बुख़ार के साथ देवदास की नाक के भीतर से सड़-सड़ करके बूँद-बूँद ख़ून टपकने लगा। उसने पूरी शक्ति से नाक दबा ली। फिर लगा कि दाँतों के पास से भी ख़ून निकल रहा है, साँस लेने में भी जैसे खिंचाव आ गया है। हाँफते-हाँफते बोला, “और कितना?”
गाड़ीवान ने कहा, “और दो कोस; रात दस बजे तक पहुँच जाएँगे।”
देवदास ने बड़ी कठिनाई से मुँह उठाकर रास्ते की ओर देखते हुए कहा, “भगवान!”
गाड़ीवान ने पूछा, “बाबू, ऐसा क्यों कर रहे हैं?”
देवदास इस बात का जवाब भी न दे सका। गाड़ी चलती रही, किंतु दस बजे न पहुँचकर लगभग रात के बारह बजे हाथीपोता के ज़मींदार बाबू के घर के सामने, पक्के चबूतरे वाले पीपल के पेड़ के नीचे आ पहुँची।
गाड़ीवान ने पुकारा, “बाबू, उतर आइए।”
कोई उत्तर नहीं। फिर पुकारा, फिर भी कोई उत्तर नहीं। तब वह घबराकर दीपक उसके मुँह के पास लाया, “बाबू, सो गए क्या?”
देवदास ताक रहा था; होंठ हिलाकर कुछ कहा, किंतु शब्द नहीं हुआ। गाड़ीवान ने फिर पुकारा, “ओ बाबू!”
देवदास ने हाथ उठाना चाहा, पर हाथ उठा नहीं; बस उसकी आँखों के कोरों से आँसू की दो बूँदें ढरक पड़ीं। तब गाड़ीवान ने बुद्धि लगाकर पीपल के नीचे के पक्के चबूतरे पर पुआल बिछाकर शय्या तैयार की।
फिर बड़ी कठिनाई से देवदास को उठाकर उस पर लिटा दिया। बाहर और कोई नहीं था, ज़मींदार का घर निस्तब्ध, निद्रामग्न था। देवदास ने बड़ी तकलीफ़ से जेब से सौ रुपए का नोट निकालकर दिया। लालटेन की रोशनी में गाड़ीवान ने देखा, बाबू उसकी ओर ताक रहे हैं, पर बोल नहीं पा रहे। वह स्थिति का अनुमान कर नोट लेकर अपनी चादर में बाँधकर रख लिया। शॉल से देवदास का मुँह तक ढँका था; सामने लालटेन जल रही थी, नया मित्र पैरों के पास बैठा सोच रहा था।
भोर हुई। सुबह ज़मींदार के घर से लोग बाहर निकले—एक आश्चर्यजनक दृश्य। पेड़ के नीचे एक आदमी मर रहा था। भद्र पुरुष। बदन पर शॉल, पाँवों में चमचमाते जूते, हाथ में अँगूठी। एक-एक कर बहुत-से लोग जमा हो गए। धीरे-धीरे भुवन बाबू के कानों तक यह बात पहुँची, उन्होंने डॉक्टर को बुलाने के लिए कहकर स्वयं उपस्थित हुए। देवदास ने सबकी ओर देखा; किंतु उसका कंठ अवरुद्ध हो गया था—एक भी बात न कह सका, बस आँखों से आँसू ढरकते रहे। गाड़ीवान जितना जानता था, उसने बताया, पर उससे कोई लाभ न हुआ। डॉक्टर ने आकर कहा, “साँस उखड़ रही है, अभी मर जाएगा।”
सभी ने कहा, “आहा!”
ऊपर बैठी पार्वती ने यह वृत्तांत सुनकर कहा, “आहा!”
किसी ने दया करके मुँह में एक बूँद पानी डाल दिया। देवदास ने उसकी ओर करुण दृष्टि से एक बार देखा, उसके बाद आँखें मूँद लीं। कुछ देर और जीवित था, उसके बाद सब समाप्त हो गया। अब कौन दाह-संस्कार करेगा, कौन छुएगा, क्या जात है, इत्यादि को लेकर तर्क-वितर्क होने लगा। भुवन बाबू ने निकट के पुलिस-स्टेशन में ख़बर दी। इंस्पेक्टर आकर तहक़ीक़ात करने लगा। तिल्ली-जिगर से मृत्यु। मुँह पर ख़ून के दाग़। जेब से दो पत्र निकले। एक तालशोनापुर के द्विजदास मुखर्जी का बंबई के देवदास को लिखा हुआ—पैसे भेजना अभी संभव नहीं। और दूसरा काशी की हरिमती देवी का उक्त देवदास मुखर्जी को लिखा हुआ—कैसे हो?
बाएँ हाथ पर अँग्रेज़ी अक्षरों में नाम का पहला अक्षर गुदा हुआ था। इंस्पेक्टर बाबू ने जाँच करके कहा, “हाँ, आदमी देवदास ही है।”
हाथ में नीले पत्थर की अँगूठी—क़ीमत अंदाज़न डेढ़ सौ रुपए, शरीर पर एक जोड़ी शॉल—क़ीमत अंदाज़न दो सौ। कपड़े-लत्ते इत्यादि सब लिख लिए गए। चौधरी महाशय और महेंद्रनाथ, दोनों ही उपस्थित थे। तालशोनापुर का नाम सुनकर महेंद्र ने कहा, “छोटी माँ के मायके का आदमी है, वे देखतीं तो—”
चौधरी महाशय ने डाँट दिया, “वह क्या यहाँ लाश की शिनाख़्त करने आएगी?”
दारोगा बाबू ने हँसते हुए कहा, “पागल है क्या!”
ब्राह्मण का मृतदेह होने पर भी, देहात में कोई छूना नहीं चाहता था; सो चांडाल आकर उसे बाँधकर ले गए। फिर किसी सूखे पोखर के तट पर अधजला छोड़ दिया—कौए-गिद्ध ऊपर आकर बैठ गए, सियार-कुत्ते शव को लेकर कलह करने लगे। फिर भी जिसने सुना, उसी ने कहा, “आहा!” नौकर-चाकर भी आपस में कहने लगे, “आहा, भद्रलोक, बड़े आदमी! दो सौ रुपए दाम की शॉल, डेढ़ सौ रुपए दाम की अँगूठी! वे सब अब दारोगा की ज़िम्मेदारी में हैं; दोनों पत्र भी उन्होंने रख लिए हैं।”
ख़बर तो सुबह ही पार्वती के कानों में पहुँच गई थी, किंतु आजकल वह किसी भी विषय में मन नहीं लगा पाती थी, इसलिए बात को ठीक से समझ नहीं पाई थी। किंतु जब सबके मुँह से वही बात सुनी, तब पार्वती ने भी विशेष ध्यान से सुनकर शाम से पहले एक दासी को बुलाकर पूछा, “क्या हुआ री? कौन मरा है?”
दासी बोली, “आहा, कोई नहीं जानता माँ! पूर्वजन्म की मिट्टी ख़रीदी हुई थी, इसीलिए मरने आया था। जाड़े-पाले में उसी रात से पड़ा था, और दिन के नौ बजे मर गया।”
पार्वती ने लंबी साँस छोड़कर पूछा, “आहा, कौन था, कुछ पता नहीं चला?”
दासी बोली, “महेंद्र बाबू सब जानते हैं, मैं उतना नहीं जानती माँ।”
महेंद्र को बुलाकर लाया गया तो उसने कहा, “तुम्हारे देश के देवदास मुखर्जी।”
पार्वती महेंद्र के अत्यंत निकट सरक आई, और तीव्र दृष्टि से देखकर पूछा, “कौन, देवदादा? कैसे जाना?”
“जेब में दो चिट्ठियाँ थीं; एक द्विजदास मुखर्जी ने लिखी है—”
पार्वती ने बात काटकर कहा, “हाँ, वे उनके बड़े दादा हैं।”
“और एक काशी की हरिमती देवी ने लिखी है—”
“हाँ, वे माँ हैं।”
“हाथ पर गुदवाकर नाम लिखा था—”
पार्वती ने कहा, “हाँ, कलकत्ता पहली बार जाकर लिखवाया था बटे—”
“एक नीले रंग की अँगूठी—”
“उपनयन के समय चाचाजी ने दी थी। मैं जाती हूँ—”, कहते-कहते पार्वती दौड़कर नीचे उतर पड़ी।
महेंद्र हतबुद्धि होकर बोला, “ओ माँ, कहाँ जाती हो?”
“देवदा के पास।”
“वह तो अब नहीं है—उसे डोम ले गए।”
“ओगो, माँ गो!”, कहकर रोते-रोते पार्वती दौड़ी। महेंद्र दौड़कर सामने आया और रोककर बोला, “तुम क्या पागल हो गई हो माँ? कहाँ जाओगी?”
पार्वती ने महेंद्र की ओर तीव्र कटाक्ष करके कहा, “महेंद्र, क्या मुझे सचमुच पागल समझ लिया है? रास्ता छोड़ो।”
उसकी आँखों की ओर देखकर, महेंद्र ने रास्ता छोड़ दिया और चुपचाप पीछे-पीछे चलने लगा। पार्वती बाहर निकल गई। बाहर तब भी नायब-गुमाश्ता काम कर रहे थे, वे ताकते रह गए। चौधरी महाशय ने चश्मे के ऊपर से झाँककर कहा, “कौन जा रहा है?”
महेंद्र ने कहा, “छोटी माँ।”
“वह क्या? कहाँ जाती है?”
महेंद्र बोला, “देवदास को देखने।”
भुवन चौधरी चीख़ पड़े, “तुम सब क्या पागल हो गए हो, पकड़ो—पकड़ो—पकड़कर लाओ उसे। पागल हो गई है! ओ महेंद्र, ओ कनवधू!”
उसके बाद दासियों और नौकरों ने मिलकर पार्वती के मूर्च्छित शरीर को खींचकर घर के भीतर पहुँचाया। दूसरे दिन उसकी मूर्च्छा टूटी, किंतु उसने कोई बात नहीं की। एक दासी को बुलाकर सिर्फ़ इतना पूछा, “रात में आए थे, न? सारी रात!”
उसके बाद पार्वती चुप हो गई।
अब इतने दिनों में पार्वती का क्या हुआ, वह कैसी है, मैं नहीं जानता। समाचार लेने की इच्छा भी नहीं होती। बस देवदास के लिए बड़ा कष्ट होता है। तुममें से जो कोई भी यह कहानी पढ़ेगा, शायद हमारी ही तरह दुःख पाएगा। फिर भी यदि कभी देवदास जैसे किसी हतभागे, असंयमी, पापिष्ठ से परिचय हो, तो उसके लिए थोड़ी प्रार्थना करना। प्रार्थना करना कि और जो भी हो, पर किसी की मृत्यु उसकी तरह न हो। मरण में कोई हानि नहीं, किंतु उस समय उसके ललाट को एक स्नेहिल कर-स्पर्श अवश्य मिले—जीवन का अंत किसी एक तो करुणा-सिक्त, स्नेहमय मुख को देखते-देखते हो। मरते समय वह किसी की आँखों में एक बूँद आँसू तो देख सके।
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